चंडीगढ़ में जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) पर बिके मकानों को लेकर वर्षों से चली आ रही अनिश्चितता अब खत्म होने जा रही है।
प्रशासन ने जीपीए पर खरीदी गई करीब 52 हजार संपत्तियों की रजिस्ट्री का रास्ता खोलने की तैयारी कर ली है। इसके लिए विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर केंद्र सरकार को मंजूरी के लिए भेज दिया गया है। प्रस्ताव को प्रशासक गुलाब चंद कटारिया की प्राथमिक स्वीकृति भी मिल चुकी है। अब अंतिम फैसला केंद्र के स्तर पर होना है।
यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो वर्ष 2011 के बाद जीपीए के माध्यम से खरीदी गई संपत्तियों को वैधता मिल जाएगी और हजारों लोगों को स्थायी मालिकाना हक प्राप्त होगा। वर्तमान में ऐसे प्रॉपर्टी धारकों पर बेदखली का खतरा बना हुआ है और वे कानूनी सुरक्षा से वंचित हैं।
प्रस्ताव के अनुसार जीपीए होल्डर को संबंधित क्षेत्र के कलेक्टर रेट या वास्तविक खरीद मूल्य (जो अधिक हो) के आधार पर 5 प्रतिशत स्टांप ड्यूटी अदा करनी होगी। इसके साथ ही अनअर्नड इंक्रीज भी देनी होगी। यह राशि उस अवधि के आधार पर तय होगी, जिसमें प्रॉपर्टी को लॉक-इन पीरियड से पहले बेचा गया है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी अलॉटमेंट की 15 वर्ष की लॉक-इन अवधि थी और उसे बीच में जीपीए के जरिये बेच दिया गया तो शेष अवधि के लिए अनअर्नड इंक्रीज वसूला जाएगा। यह दर बाजार मूल्य और कलेक्टर रेट के आधार पर तय होगी। नई नीति लागू होने से प्रशासन को बड़े स्तर पर राजस्व मिलेगा। साथ ही वर्षों से चल रहे कानूनी विवादों में भी कमी आएगी। अभी जीपीए के जरिये होने वाले लेन-देन में न तो सरकार को राजस्व मिलता है और न ही खरीदार को पूर्ण कानूनी सुरक्षा।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर नीति
यह प्रस्ताव 2011 के सुप्रीम कोर्ट के सूरज लैम्प फैसले के अध्ययन के बाद तैयार किया गया है। उस फैसले में जीपीए के माध्यम से संपत्ति की खरीद-फरोख्त को वैध रजिस्ट्री का विकल्प नहीं माना गया था। अब प्रशासन उसी के अनुरूप एक नियमितीकरण नीति लाने की तैयारी में है।
कई कॉलोनियों में बड़ी संख्या में जीपीए प्रॉपर्टी
शहर के सेक्टर-29, 30, 31, मलोया, रामदरबार और सेक्टर-38 वेस्ट जैसी कॉलोनियों में बड़ी संख्या में मकान जीपीए के जरिये बिके हैं। कई संपत्तियां तो तीन से चार बार तक हाथ बदल चुकी हैं। वर्तमान में ईडब्ल्यूएस और छोटे फ्लैट 20 से 25 लाख रुपये में जीपीए पर बिक रहे हैं।
जीपीए पर बिकी प्रॉपर्टी की रजिस्ट्री खोलने के लिए प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया है। मंजूरी मिलते ही प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। स्टांप ड्यूटी और अनअर्नड इंक्रीज के आधार पर रजिस्ट्री की जाएगी।
-निशांत कुमार यादव, डीसी कम एस्टेट ऑफिसर, चंडीगढ़ प्रशासन
क्या है सूरज लैंप फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2011 में सूरज लैंप एंड इंडस्ट्रीज बनाम हरियाणा राज्य मामले में अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया था कि जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए), एग्रीमेंट टू सेल और वसीयत के आधार पर प्रॉपर्टी की खरीद-फरोख्त को वैध मालिकाना हक नहीं माना जाएगा। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि केवल रजिस्टर्ड सेल डीड (रजिस्ट्री) ही संपत्ति के स्वामित्व का कानूनी प्रमाण है। फैसले के बाद जीपीए के जरिए होने वाले सौदों पर रोक लग गई क्योंकि इनका इस्तेमाल अक्सर स्टांप ड्यूटी और टैक्स बचाने के लिए किया जाता था। हालांकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि जीपीए का उपयोग प्रतिनिधि के रूप में कार्य करने के लिए वैध है लेकिन इसे प्रॉपर्टी ट्रांसफर का माध्यम नहीं माना जा सकता। इस फैसले के बाद देशभर में लाखों जीपीए प्रॉपर्टी धारक कानूनी रूप से असमंजस में आ गए जिनके लिए अब नियमितीकरण की नीतियां बनाई जा रही हैं।