शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर बनाने वाले एचआईवी वायरस अब दिमाग तक पहुंच सकता है। इस स्थिति से बचाव के लिए पीजीआई एआरटी सेंटर के विशेषज्ञों ने शोध कर चौंकाने वाले परिणाम हासिल किए हैं। उनके शोध परिणाम को एथीकल कमेटी ने भी स्वीकृति दे दी है। इस आधार पर अब मरीजों को इलाज दिया जाना शुरू कर दिया गया है।
सेंटर के विशेषज्ञों ने न्यूरोलॉजिकल बदलाव की शिकायत करने वाले मरीजों के खून के साथ ही रीढ़ की हड्डी से फ्लूड निकालकर उसकी जांच की। उनके खून में तो वायरस तो नहीं मिला, लेकिन फ्लूड में हाई वायरल लोड यानी काफी ज्यादा मात्रा में संक्रमण पाया गया। इस जांच परिणाम के आधार पर डॉक्टरों ने ऐसे मरीजों को दी जाने वाली एआरटी को स्वीच कर उसके अगले चरण की एआरटी देनी शुरू की गई। इसके बाद उनमें तेजी से सुधार हुआ।
सेंटर की सीनियर मेडिकल ऑफिसर डॉ. रविन्दर कौर ने बताया कि इस स्थिति को सीएसएफ वायरल स्कैप नाम दिया गया है। इसके आधार पर उन मरीजों के इलाज में बदलाव कर उन्हें बेहतर करने में सफलता प्राप्त की। इस शोध में पीजीआई के इम्यूनोपैथालॉजी विभाग के साथ मिलकर काम किया गया।
दिमागी स्थिति बिगड़े तो न करें नजरअंदाज
एआरटी सेंटर में आने वाले एचआईवी संक्रमित मरीजों के लक्षणों पर भी गौर करना बेहद जरूरी है। शोध के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर प्रो. अमन का कहना है कि मरीजों के रोग प्रतिरोधक क्षमता के आधार पर अन्य बीमारियों से बचाव के साथ ही उनके न्यूरोलॉजिकल प्रभाव पर नजर रखना भी जरूरी है। अगर कोई मरीज बार-बार शारीरिक असंतुलन, याददाश्त की कमजोरी, लगातार सिर दर्द, झनझनाहट, सूनापन की शिकायत करे तो उनकी सीएसएफ वायरल स्केप जांचनी जरूरी हो जाती है क्योंकि ऐसे मरीजों के ब्रेन तक संक्रमण पहुंच चुका होता है।
ब्लड टेस्ट के साथ की फ्लूड की जांच, नजर आए सकारात्मक परिणाम
प्रो. अमन ने बताया कि इससे पहले तक संक्रमित मरीज के खून की जांच कर उसमें संक्रमण के स्तर का पता लगाकर उसके अनुपात में एआरटी शुरू की जाती थी। जब ओपीडी में ऐसे मरीज आने लगे जिन्हें न्यूरो संबंधी समस्याएं परेशान कर रही थीं तो लक्षणों में बदलाव को नोटिस किया गया। इस आधार पर तय किया गया कि उनके दिमाग में संक्रमण के स्तर को जांचा जाएगा। इसके बाद उन मरीजों को चिह्नित कर उनके रीढ़ की हड्डी से फ्लूड लेकर उसमें संक्रमण की जांच की गई। जिसमें संक्रमण का स्तर काफी ज्यादा पाया गया। इसके बाद उन मरीजों के एआरटी (दी जाने वाली दवाओं के अलग-अलग चरण को) लाइन में बदलाव किया गया। जिसके बाद उनके इलाज में सकारात्मक परिणाम नजर आए।
संक्रमण ऐसे करता है प्रभावित
एड्स एक वायरस के कारण होता है जिसे ह्यूमन इम्यूनो डेफिशियेंसी वायरस या एचआईवी कहा जाता है। एचआईवी से सीडी4 टी नामक कोशिका नष्ट हो जाती है यह शरीर को रोगों से बचाता है। जो शरीर से लड़ने वाली बीमारियों की मदद करने के लिए महत्वपूर्ण विशिष्ट रक्त कोशिकाओं को नष्ट कर मानव शरीर को नुकसान पहुंचाती है।
एचआईवी संक्रमण के दौरान संक्रमित मरीजों के खून की जांच की जाती है। उसके आधार पर उनकी एआरटी शुरू की जाती है। इस शोध के बाद एक बात साफ हो गई कि संक्रमण का दायरा दिमाग तब पहुंच सकता है इसलिए लक्षणों को नजरअंदाज किए बिना उनकी जांच कर उसके परिणाम के आधार पर दवाएं शुरू करनी चाहिए।
-प्रो. अमन शर्मा, पीजीआई एआरटी सेंटर के नोडल अधिकारी व शोध के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर