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छायावाद के दौर में ही हिंदी कविता के साथ हिंदी आलोचना का विस्तार हुआः डॉ. प्रभाकर सिंह

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चंडीगढ़। पंजाब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के कही अनकही विचार मंच की ओर से शुक्रवार को वेब संवाद का आयोजन किया गया। इसमें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से डॉ. प्रभाकर सिंह मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। उन्होंने ‘हिंदी आलोचना और छायावाद’ पर कहा कि यूं तो छायावाद पर कई प्रतिष्ठित आलोचकों ने लिखा है। उदाहरण के लिए नामवर सिंह की पुस्तक ‘छायावाद’ भी एक मील के पत्थर की तरह है। लेकिन वह आज मुख्य रूप से तीन आलोचक शिवदान सिंह चौहान, विजयदेव नारायण साही और रमेशचंद्र शाह के प्रसंग से छायावाद पर चर्चा करना चाहेंगे।
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रिवदान सिंह चौहान द्वारा लिखे एक निबंध के हवाले से बताया कि छायावाद के कवियों में क्रांतिकारी चेतना और सामंतवाद के प्रति विरोध था। उन्होंने बताया कि छायावाद के दौर में ही हिंदी कविता के साथ हिंदी आलोचना की व्यापक जमीन का विस्तार होता है।
तुलनात्मक आलोचना के फेर में न पड़ें
व्यांख्यान के बाद प्रश्न-उत्तर का सत्र भी हुआ, जिसमें एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि हमें तुलनात्मक आलोचना के फेर में नहीं पड़ना चाहिए। विभागाध्यक्ष डॉ. गुरमीत सिंह ने सभी का आभार व्यक्त करते हुए बताया कि कही अनकही विचार मंच के कार्यक्रमों की श्रृंखला में अगले शुक्रवार 25 सितंबर को पुर्तगाल के लिस्बन विश्वविद्यालय के प्रो. शिव कुमार सिंह का ‘भाषाओं में शब्दों की आवाजाही’ विषय पर विशेष व्याख्यान होगा। आज के कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से शोधार्थी एवं प्राध्यापकों सहित 40 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जिनमें विभाग के प्रो. सत्यपाल सहगल, तिरुपति से प्रो. राम प्रकाश, राजकीय महाविद्यालय सेक्टर - 42 से डॉ. हरप्रीत कौर, प्रयागराज से डॉ. ज्ञानेन्द्र शुक्ल और प्रशांत मिश्रा शामिल रहे।
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