हिमाचल प्रदेश के गवर्नर आचार्य देवव्रत ने कहा कि दुनिया में पर्यावरण को दूषित करने में 40 फीसदी जिम्मेदार कृषि विभाग और यूनिवर्सिटी है, जिन्होंने किसानों को सही तरीके से जागरूक नहीं किया है। इसी का नतीजा है कि हरित क्रांति के नाम पर खेतों में धड़ल्ले से कीटनाशक दवाओं का प्रयोग हो रहा है। पंजाब और हरियाणा की जमीनें बंजर हो चुकी हैं।
एक स्वस्थ जमीन में आर्गेनिक कार्बन की मात्रा .9 फीसदी तक होनी चाहिए, लेकिन इन दोनों प्रदेशों की खेती जमीन में इसका स्तर .3 तक पहुंच चुका है। अब कीटनाशक और रासायनिक खादों को डालकर खेती हो रही है। आचार्य देवव्रत सोमवार को लुधियाना मैनेजमेंट एसोसिएशन के समारोह में पहुंचे थे।
2022 तक हिमाचल होगा रसायन मुक्त
आचार्य देवव्रत के अनुसार हिमाचल में भी कैंसर धीरे-धीरे अपने पैर पसार रहा है। आईजीएमसी शिमला में तैनात सीनियर डॉक्टर की रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल के जिन एरिया में सेब के बाग हैं, वहां पर हर साल 25 फीसदी कैंसर मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण पेड़ पर फल लगने से लेकर सेब तोड़ने तक 14 कीटनाशक स्प्रे का किया जाना है। इसलिए हिमाचल को रसायन मुक्त करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है और साल 2022 तक इसे पूरी तरह से रसायन मुक्त प्रदेश बना दिया जाएगा।
प्राकृतिक कृषि सब बीमारियों का हल
लोगों को रसायन खेती से हो रहे दुष्प्रभाव के प्रति जागरूक करने के साथ गवर्नर देवव्रत ने कहा कि इसका एक ही हल है प्राकृतिक खेती। एक गाय से 30 एकड़ जमीन की खेती हो सकती है। गाय के एक ग्राम गोबर में 300 से 500 करोड़ जीवाणु होते हैं। इस बात की वह खुद लैबोरेटरी से जांच भी करवा चुके हैं। इसके इस्तेमाल से पहले साल खेत में फसल का झाड़ दोगुणा हो जाता है। रसायन का प्रयोग कर जहां पंजाब और हरियाणा के किसान एक एकड़ जमीन से 22 क्विंटल फसल ले रहे है, वहीं उनके खेत में यह झाड़ 32 क्विंटल है।