गर्भपात की अनुमति को लेकर दाखिल याचिका पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अविवाहित महिलाएं जो यौन स्वायत्तता के अधिकार का प्रयोग करती हैं, उनकी गर्भ गिराने की मांग पर विचार से इनकार नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा कि यौन स्वायत्तता अधिकार है, लेकिन इसके साथ आने वाली जिम्मेदारियों का भी नागरिकों को ध्यान रखना चाहिए।
पटियाला निवासी युवती ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए बताया कि वह एक युवक के साथ सहमति संबंध में रह रही थी और बाद में दोनों अलग हो गए। कुछ समय बाद उसे पता चला कि वह गर्भवती है और उसका गर्भ 26 सप्ताह का हो चुका है। हाईकोर्ट ने इस मामले में मेडिकल बोर्ड गठित करने का आदेश दिया था। मेडिकल बोर्ड ने पहले भ्रूण जीवित पैदा होने की संभावना और इस प्रकार गर्भावस्था को जारी रखने की सिफारिश की थी, लेकिन कोर्ट ने बोर्ड को दोबारा टर्मिनेशन आफ प्रेग्नेंसी की संभावना की फिर से जांच करने का निर्देश दिया।
जस्टिस विनोद एस भारद्वाज ने कहा कि इससे याची को अपरिवर्तनीय मानसिक खतरा होगा, युवती सहमति से रिश्ते में थी और बाद में अलग हो गई। मेडिकल बोर्ड की राय है कि भ्रूण संभव जीवित पैदा होगा। इस प्रकार गर्भावस्था को जारी रखने की सिफारिश की गई।
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी अधिनियम के अनुसार 20 से 24 सप्ताह के बाद केवल कुछ श्रेणियों की महिलाओं को गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति है। जस्टिस भारद्वाज ने कहा कि कोर्ट समय से पहले प्रसव की संभावना और उसके आदेश से बच्चे पर पड़ने वाले परिणामों से अनभिज्ञ नहीं रह सकता है। समानता को संतुलित करने और याचिकाकर्ता को कलंक और शर्मिंदगी से बचाने के लिए कोर्ट का दखल जरूरी है। ऐसे में कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि अगर गर्भपात संभव नहीं है तो सरकार की तरफ से याचिकाकर्ता को बिना किसी शुल्क सभी आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं और यह सुनिश्चित किया जाए कि प्रसव सुरक्षित तरीके से हो।