पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कनाडा में रहने वाले एक दंपती को भारत में सहायक प्रजनन तकनीक (आईवीएफ) के माध्यम से दूसरा बच्चा पैदा करने की अनुमति दे दी है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पहले से तैयार भ्रूण के आधार पर उपचार जारी रखने से केवल आयु सीमा का हवाला देकर इनकार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जगमोहन बंसल की पीठ ने 50 वर्ष से अधिक आयु की महिला को भ्रूण प्रत्यारोपण कराने की अनुमति प्रदान की। यह भ्रूण छह वर्ष पहले तब तैयार किए गए थे, जब महिला निर्धारित आयु सीमा के भीतर थी।
याचिकाकर्ता दंपती ने वर्ष 2019 में एक आईवीएफ केंद्र और नर्सिंग होम से संपर्क किया था। उस समय उनकी आयु क्रमशः 47 और 48 वर्ष थी। चिकित्सीय प्रक्रिया के तहत 17 दिसंबर 2019 को चार भ्रूण तैयार किए गए, जिनमें से एक से एक बालिका का जन्म हुआ जबकि तीन भ्रूण अब भी सुरक्षित रखे गए हैं।
बाद में महिला की आयु 50 वर्ष से अधिक हो जाने के कारण संबंधित प्राधिकरणों ने आगे की प्रक्रिया पर आपत्ति जताई। इसके बाद दंपती ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए शेष सुरक्षित भ्रूणों के उपयोग की अनुमति मांगी। याची पक्ष ने दलील दी कि भ्रूण उस समय तैयार किए गए थे जब महिला आयु सीमा के भीतर थी।
दूसरी ओर, आईवीएफ केंद्र ने अदालत को बताया कि महिला पूरी तरह स्वस्थ है और गर्भधारण में कोई गंभीर चिकित्सीय बाधा नहीं है। हालांकि, यह शर्त रखी कि यदि उपचार के दौरान कोई चिकित्सीय जटिलता उत्पन्न होती है तो उसकी जिम्मेदारी दंपती को स्वयं उठानी होगी। दंपती ने इस शर्त को स्वीकार करते हुए आवश्यक हलफनामा देने पर सहमति जताई।
सभी पक्षों की दलीलों और पूर्व निर्णय को ध्यान में रखते हुए अदालत ने याचिका स्वीकार कर ली और निर्देश दिया कि दंपती संबंधित प्राधिकरण के समक्ष एक दिन के भीतर आवश्यक आश्वासन प्रस्तुत करें। इसके बाद चिकित्सा संस्थान उपचार आगे बढ़ाने के लिए स्वतंत्र होगा।