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जमानत के लिए आरोपी के आपराधिक इतिहास में बरी होने वाले मामलों की नहीं होनी चाहिए गणना: हाईकोर्ट

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-गुरुग्राम निवासी व्यक्ति को जमानत देते हुए हाईकोर्ट ने जारी किया अहम आदेश
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि किसी आरोपी की जमानत के लिए उसके आपराधिक इतिहास की गणना करते हुए उन मामलों को नहीं जोड़ना चाहिए जिनमें वह बरी हो गया हो, कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल की गई हो या उसे आरोप मुक्त कर दिया गया हो। हाईकोर्ट ने गुरुग्राम निवासी व्यक्ति को जमानत देते हुए यह अहम टिप्पणियां की हैं। याचिका दाखिल करते हुए गुरुग्राम निवासी धर्मराज ने 31 जुलाई 2020 को दर्ज एफआईआर में जमानत की मांग की थी। याची पर आरोप है कि उसने शिकायतकर्ता को बुरी तरह से पीटा। एफआईआर के अनुसार शिकायतकर्ता लुकमन अपनी पिकअप में जा रहा था कि कुछ लोगों ने आकर उससे वाहन रुकवाया। वाहन में भैंस का मांस था और इसके बाद उसकी जमकर पिटाई की गई और वाहन को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस मामले में हाईकोर्ट से याची को जमानत मिल गई थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने जमानत खारिज कर उसे सरेंडर करने का आदेश दिया था। आदेश के अनुसार याची ने सरेंडर कर दिया और ऐसे में अब उसने नियमित जमानत की मांग की थी। याची ने बताया कि उसके खिलाफ एक अन्य मामला भी दर्ज था लेकिन वह बरी हो चुका है। हाईकोर्ट ने सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद कहा कि जमानत के लिए आपराधिक इतिहास पर विचार करते हुए केवल उन्हीं मामलों की गणना करनी चाहिए जिनमें ट्रायल चल रहा हो, एफआईआर लंबित हो और उसे आरोपी बनाया गया हो। जिन मामलों में उसे बरी किया गया हो, पुलिस ने दोषमुक्त किया हो, कैंसिलेशन रिपोर्ट दाखिल की हो उन पर विचार नहीं करना चाहिए। ऐसे में हाईकोर्ट ने इस मामले में याची को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
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