पूर्वज की समाधि को नष्ट करने के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह आईपीसी की धारा 295 के तहत अपराध नहीं है। हालांकि इसे उस परिवार के सदस्य का अपमान माना जा सकता है। पूर्वज की समाधि को धार्मिक स्थल नहीं माना जा सकता और ऐसे में यह इस धारा के तहत दंडनीय नहीं है।
मोगा निवासी कृष्णा देवी व अन्य ने हाईकोर्ट को बताया कि उनका 40 कनाल, 8 मरला जमीन को लेकर विवाद था। उसके पिता ने संपत्ति अपनी बेटी कृष्णा देवी के नाम कर दी थी। इस संपत्ति को लेकर दोनों पक्षों के बीच लड़ाई हुई और भाई ने 2015 में याची के खिलाफ पुलिस को शिकायत दी कि उसने शिकायतकर्ता की जमीन में पूर्वज के समाधियों को हानि पहुंचाई है।
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पुलिस ने शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर कार्रवाई आरंभ कर दी। याची ने कहा कि विवादित भूमि पर अपना हक साबित करने में नाकाम रहने पर भाई ने यह शिकायत दी है। साथ ही याची ने यह भी कहा कि यदि मान भी लें कि समाधि नष्ट की है तो भी आईपीसी की धारा 295 (किसी वर्ग के धर्म का अपमान करने के इरादे से पूजा स्थल को चोट पहुंचाना या अपवित्र करना) के तहत कोई अपराध नहीं माना जा सकता।
सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट में निचली अदालत के संज्ञान में यह बात नहीं लाई गई कि जमीन याची के कब्जे में थी और समाधि भी उसकी जमीन में थी। अगर यह तथ्य निचली अदालत के संज्ञान में लाया गया होता तो समन जारी होने की संभावना नहीं होती। समाधि तोड़ने पर कोई अपराध नहीं बनता है क्योंकि समाधि पूजा स्थल के बराबर नहीं मानी जा सकती। शिकायतकर्ता ने कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग किया। इस टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने एफआईआर व निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया।