नरेश कुमार गोयल ने एडवोकेट विकास चतरथ के माध्यम से हाईकोर्ट को बताया था कि वह फतेहगढ़ साहिब की कोऑपरेटिव सोसायटी में डिप्टी रजिस्ट्रार के तौर पर कार्य कर रहा था। उसे 30 नवंबर, 2015 को रिटायर होना था, लेकिन उसे एक साल की एक्सटेंशन मिल गई
रिटायरमेंट की तय तिथि से तीन माह पहले यानी 31 अगस्त, 2017 को उसे 15 जनवरी, 2017 की एफआईआर के चलते सेवा मुक्त कर दिया गया।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सेवा समाप्ति के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि एफआईआर से कोई दोषी नहीं हो जाता। कर्मचारी की सेवा पर तभी निर्णय लिया जाना चाहिए जब उसके खिलाफ अदालत में आरोप तय हो जाएं। हाईकोर्ट ने याचिका मंजूर करते हुए याची को बची हुई सेवा का वेतन जारी करने का आदेश दिया है।
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याचिका दाखिल करते हुए नरेश कुमार गोयल ने एडवोकेट विकास चतरथ के माध्यम से हाईकोर्ट को बताया था कि वह फतेहगढ़ साहिब की कोऑपरेटिव सोसायटी में डिप्टी रजिस्ट्रार के तौर पर कार्य कर रहा था। उसे 30 नवंबर, 2015 को रिटायर होना था, लेकिन उसे एक साल की एक्सटेंशन मिल गई। एक वर्ष पूरा होने के बाद उसे एक और वर्ष की एक्सटेंशन मिल गई और उसे 30 नवंबर, 2017 को रिटायर होना था।
रिटायरमेंट की तय तिथि से तीन माह पहले यानी 31 अगस्त, 2017 को उसे 15 जनवरी, 2017 की एफआईआर के चलते सेवा मुक्त कर दिया गया। इसी निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि याची ने समय से याचिका दाखिल कर दी थी, लेकिन कोर्ट की कार्रवाई में देरी हुई। ऐसे में उसकी सेवा अवधि बढ़ाने का आदेश नहीं दिया जा सकता। कोर्ट की देरी के चलते याची को भुगतने नहीं दिया जा सकता और ऐसे में सरकार तीन माह का वेतन, पेंशन काट कर याची को भुगतान करे। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल एफआईआर के आधार पर सेवा समाप्त करने का निर्णय सही नहीं है। चालान दाखिल होने और आरोप तय होने के बाद ही कर्मचारी की सेवा को लेकर निर्णय लिया जाना चाहिए।