फेज-छह स्थित मैक्स सुपर स्पेशएलिटी अस्पताल में सीनियर सिटीजन के लिए एक वर्कशॉप आयोजित की गई। वर्कशॉप की थीम ‘एंड्रोपॉज एक कम जाना पहचाना सत्य’ थी। इस मौके पर ओबेस्ट्रटिक्स एवं गाइनोकोलॉजी की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. प्रीति जिंदल बुजुर्गों से रूबरू हुईं।
उन्होंने कहा कि महिलाओं में रजोनिवृति के बारे में काफी जानकारी है। लेकिन बहुत कम भारतीय जानते हैं कि रजोनिवृति से पुरुष भी प्रभावित होते हैं।
40 वर्ष से अधिक उम्र के 35 प्रतिशत भारतीय पुरुष एंड्रोपॉज से प्रभावित हैं। जो कि एक तरह से पुरुषों की रजोनिवृति है, जो कि महिलाओं को प्रभावित करती है। इसे एंड्रोजेन डेफीसेंसी इन एजिंग मेल्स (एडीएएम) रोग के तौर पर भी जाना जाता है।
डा. जिंदल ने कहा कि सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि महिला रजोनिवृति के मुकाबले पुरुष रजोनिवृति को बहुत कम मान्यता प्राप्त है। इसे अभी भी एक सामाजिक दाग ही समझा जाता है।
एडीएएम की उत्तर भारत में मौजूदगी लगातार बढ़ रही है। एंड्रोपॉज के प्राथमिक लक्षण को सीधे यौन क्षमता में कमी या पुरुषों में यौन संबंधों की इच्छा में कमी से नहीं जोड़ना चाहिए। बल्कि ये बोन डेन्सिटी और मांसपेशियों के दमखम में कमी और कई बार मोटापे के चलते भी यह तेजी से बढ़ती है। यह सामान्य तौर पर 30 वर्ष की उम्र से शुरू होता है।
उन्होंने ने बताया कि टेस्टोस्ट्रोन के स्तर में कमी से पुरुष अक्सर कई समस्याओं से पीड़ित हो जाते हैं। जैसे कि थकान, यादाश्त कमजोर होना, लगातार गुस्सा आना, हताशा, चिड़चिड़ापन, वजन में अचानक कमी या बढ़ोतरी होना,आलसी होना, बेआराम महसूस करना, परंतु इन बदलावों के कारणों का पता न लग पाना है।