एफडी की जगह बीमा करना बीमा कंपनी को महंगा पड़ गया। उपभोक्ता फोरम ने बीमा कंपनी को सेवा में कोताही का दोषी करार दिया। साथ ही शिकायतकर्ता को फंड वैल्यू रिलीज करने के साथ ही उस पर नौ प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज देने के निर्देश दिए।
सेवा में कोताही के लिए बीमा कंपनी को 50 हजार रुपये मुआवजा और 15 हजार रुपये मुकदमा खर्च शिकायतकर्ता को देना होगा। आदेश की प्रति मिलने के 45 दिन के अंदर पालन न करने पर फंड वैल्यू पर 18 प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज देना होगा। यह निर्देश जिला उपभोक्ता विवाद निवारण फोरम-2 चंडीगढ़ के सदस्य जसविंदर सिंह सिद्धू ने सुनवाई के बाद दिया है।
गुरप्रीत कौर निवासी धनास ने सेक्टर-43 स्थित एचडीएफसी एसएल चंडीगढ़ और मुंबई स्थित एचडीएफसी स्टैंडर्ड लाइफ इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के खिलाफ शिकायत दी थी। गुरप्रीत कौर ने कहा कि बीमा कंपनी के एजेंट ने उन्हें कहा कि फिक्स डिपोजिट में निवेश करने पर उसमें बेहतर रिटर्न मिलेगा। शिकायतकर्ता ने एजेंट के कहने पर पेपर पर साइन कर दिए।
उन्होंने दो-दो लाख की दो एफडी 31 जुलाई 2010 को करवाई, जबकि 7 सितंबर 2010 को चार लाख रुपये की एफडी करवाई। बीमा कंपनी के एजेंट ने उनसे कहा था कि इसकी पर्ची बाद में दे दी जाएगी। बार-बार निवेदन के बाद भी उन्हें पर्ची नहीं दी गई।
शिकायतकर्ता ने उपभोक्ता फोरम को बताया कि 22 जनवरी 2013 को एक रजिस्टर्ड लिफाफा रिसीव हुआ। उसमें तीन बीमा पॉलिसी थी। इसके बाद उन्होंने एक फरवरी 2013 को दूसरे पक्ष को लिखित में शिकायत दी कि उनकी पॉलिसी रद्द कर पैसा वापस किया जाए, लेकिन बीमा कंपनी ने यह कहते हुए रद्द कर दिया कि फ्री लुक पीरियड के दौरान अप्रोच नहीं किया गया।