इस चुनाव में चिरंजीव की माता शकुंतला व पत्नी व लालू की बेटी अनुष्का ने भी गलियों में खूब पसीना बहाया। लेकिन कैप्टन की रणनीति के सामने उनके धुर विरोधी राव इंद्रजीत के सभी प्रयास धरे रह गए। लेकिन इतना जरुर है कि दादा से लेकर पोता तक पहली बार चुनाव लड़े और जीते।
चुनाव से पहले कौन लड़े इस पर भी असमंजस में थे कैप्टन
रेवाड़ी सीट पर भाजपा में मचे घमसान के बीच कैप्टन अजय यादव भी असमंजस में थे। खुद चुनाव लड़े या बेटे को मैदान में उतारा जाए लगातार कैप्टन के द्वारा समर्थकों व रणनीतिकारों से चर्चा की जा रही थी। लोकसभा में हार के बाद उन्होंने अंत में बेटे के लिए ही टिकट की मांग रखी। टिकट मिलने के बाद कैप्टन ने रुठों को मनाने में दिन-रात काम किया।
पंजाबी वोट बैंक साधने में कामयाब रहे कैप्टन
2014 की हार से पहले शहर के पंजाबियों को कैप्टन का बड़ा वोट बैंक माना जाता था। करारी हार व भाजपा की और खट्टर को प्रदेश का सीएम बनाने के बाद लगने लगा की पंजाबी समुदाय कैप्टन से दूर हो गया है। लोकसभा में भी कैप्टन को शहर से खासे वोट नहीं मिल पाए थे।
ऐसे में विरोधियों द्वारा कहा जा रहा था कि सीएम खट्टर के चलते पंजाबी वोट भाजपा के पक्ष में जाएंगे। लेकिन कैप्टन ने रात के दो-दो बजे तक पंजाबी समुदाय के लोगों के घर-घर जाकर रुठों को मनाने का काम किया। इसका उनको परिणाम भी मिला।
भाजपा की कलह कैप्टन के लिए बनी संजीवनी
टिकट वितरण के बाद से ही रेवाड़ी भाजपा में कलह शुरु हो गई थी। भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष के कार्यालय में कार्यकर्ताओं की ओर से केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत को खरी-खोटी सुनाने के बाद कलह कम होने की बजाय बढ़ गई। वहीं भाजपा के बागी विधायक का चुनाव लडना भी कैप्टन के पक्ष में गया।
कापड़ीवास भी जीत के बाद भाजपा में जाने की बात कहकर चुनाव लड़ रहे थे। इसके चलते भाजपा समर्थक अनेक लोग कापड़ीवास के साथ चुनाव में लगे हुए थे। राजनीतिक पंडितों की ओर से कैप्टन की राजनीति का अंत बताया जा रहा था, लेकिन भाजपा की कलह उनके लिए संजीवनी बनकर आई।