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कहने को कुलदेवी का कुआं, पर हालात इतने बदतर

Mon, 11 Aug 2014 06:21 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, झज्जर/चंडीगढ़
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बेरी को लोग मंदिरों और हवेलियों की नगरी कहते हैं, लेकिन अंदर-बाहर से देखने पर पता चलता है कि यह तो शाही तालाबों और कुओं की नगरी है। ऐतिहासिक दृष्टि से सबसे अधिक तालाब तो यहां हैं ही, साथ ही वास्तुकला की दृष्टि से भी ये अद्भुत हैं।
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बेरी आते हुए झज्जर मार्ग पर लिखा है, धर्मनगरी बेरी में आपका स्वागत है। लेकिन जिस तरह से वरुण देवता के प्रति यहां का समाज निष्ठुर हुआ है, उससे लगता है कि धर्म की नगरी में अब पाप भी बहुत बढ़ गया है। जिस समाज की आर्थिक धुरी का आधार जोहड़ और कुएं रहे हों, वहां के समाज ने अपने सारे तालाबों, जोहड़ों और कुओं का एक-एक कर खात्मा कर दिया है।

बेरी के दक्षिण-पश्चिम में स्थित कुलदे सरोवर पर सूखे सावन के अंतिम दिनों में चिलचिलाती धूप में खड़ा होना बेहद मुश्किल था। ऊपर से सड़ांध मारते तालाब और बंद पड़े कुओं की हालत ने इसे और जटिल बना दिया। तालाब के बारे में पूछने पर वहां से गुजर रहे किसान सतीश बोले, कै करैगा तालाबांह के बारे म्ह पूछकै, हाड़ै तो तालाब ए तालाब सैं भाई अर न्यूह कहले इब ये गंदे पाणी के जोहड़ होग।
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इस तालाब का क्या नाम है- कुलदे। दादा कुलदे का तालाब। सेवानिवृत्त शिक्षक रमेश शर्मा ने बेरी का इतिहास लिखा है। वे बताते हैं, कुलदे यानी कुलदेव का तालाब। कुलदेव से बिगड़कर यह कुलदे हो गया। यह तालाब तब बना था जब तकरीबन 850 साल पहले बेरी बसा। परंपरा के मुताबिक हरियाणा में बस्तियां सरोवरों या बंधों के किनारे ही बसती थी। कई गांव में इन जलस्रोतों को देवसर, गंगसर, देवबंध, रामसर, दादासर भी कहते हैं।

कुलदे आज अपना अस्तित्व लगभग खो चुका है। कहने को बच्चे के जन्म पर परिजन और नवविवाहित जोड़े अब भी परंपरागत रूप से जुटते हैं, लेकिन बेरी के निष्ठुर समाज ने अपने कुलदेव की बहुत दुर्गति की है। कुलदे के निकट बसा है गांव का छाज्याण पाना (बस्ती)। आज कुलदे के बीच से रास्ता निकाल दिया गया है।

इस पर कई कब्जे भी हैं हालांकि ग्रामीण इन्हें प्लॉट बता रहे हैं और कहते हैं कि राजस्व रिकार्ड में यहां उनकी जमीन थी। कुलदे का पानी अब बदबूदार है। गांव के एक बड़े हिस्से का गंदा पानी कुलदे में आता है। घरों में पानी पिलाने के बाद कुछ लोग यहां भैंसों को नहलाने ले आते हैं।

बेरी निवासी 80 साल की सावित्री 61 साल पहले बादली से यहां ब्याहकर आई थीं। वे बताती हैं कि इस पाने के लोगों के लिए पहले कुलदे केवल पूजनीय नहीं था बल्कि वे कुलदे जीते थे। हर वर्ष बारिश आने से कुछ दिन पहले पूरा गांव मिलकर कुलदे की खुदाई, सफाई करता था। इस काम में हर घर से तसला, एक कस्सी और एक आदमी का योगदान कम से कम होता था।

कुओं से आती है दुर्गंध
कुलदे पर अब दो कुएं हैं। इन कुओं का पानी मीठा था। अब ये कुएं चालू हालत में नहीं हैं। कुओं का पानी खींचने के रास्तों पर चारों ओर लोहे के मोटे जाल लगा दिए गए हैं ताकि कोई इनमें गिरकर डूब न जाए। गांव की ओर तालाब की उत्तरी पुश्त पर बेरी के सेठ रघुनाथ सहाय छज्जूराम ने एक भव्य कुएं का निर्माण 106 साल पहले कराया था।

कुओं का महत्व भौंणों (पानी खींचने में सहायक चकली) से आंका जाता है। इस कुएं पर आठ भौंण लगी थीं। लोग इसे जंगी क्यां का (जंगी यानी जुझारू वालों का कुआं) भी कहते हैं। यहीं पर दूसरा कुआं तकरीबन 215 साल पहले यहीं के जाटों ने बनवाया। यह कुआं साठ हाथ गहरी और 9 हाथ चौड़ी नाल का गजब का कुआं है। 10 भौंण वाला यह कुआं पहले कुएं से तकरीबन 100 गज की दूरी पर है। दोनों कुओं के पानी में से दुर्गंध आती है।
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