पंचायत चुनाव के लिए नामांकन भरने के इच्छुक लोगों के लिए बड़ी गुड न्यूज है। आयोग ने अभी-अभी एक ऐलान किया है। इसके तहत अब कोई भी नामांकन भर सकता है। कोई शर्त लागू नहीं होगी। नामांकन का मंजूर होना सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगी। तब तक कोई भी चुनाव लड़ने का इच्छुक नामांकन भर सकता है।
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राज्य चुनाव आयुक्त राजीव शर्मा ने बताया कि सभी उपायुक्तों को निर्देश जारी कर दिए गए हैं। रिटर्निंग ऑफिसर किसी का भी नामांकन लेने से इंकार नहीं कर सकता। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत राज संशोधन विधयेक को लेकर सरकार को बड़ा झटका दिया है।
कोर्ट ने शैक्षिक योग्यता पर रोक लगाते हुए हरियाणा सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट में आज हरियाणा सरकार ने अपना पक्ष रखा। अटॉर्नी जनरल सरकार की ओर से कोर्ट में पेश हुए। अब मामले की अगली सुनवाई 21 सितंबर को होगी।
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सुप्रीम कोर्ट ने इसी सवाल पर दिया था स्टे
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को नोटिस जारी करके 22 सितंबर का अपना पक्ष रखने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने कमलेश की याचिका पर स़ुनवाई करते हुए स्टे लगाया था। दो बार चुनाव लड़ चुकी कमलेश को उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट उनके हक में फैसला 83 प्रतिशत दलित महिलाओं को चुनाव लड़ने के लिए राहत प्रदान करेगा।
कमलेश कैमरी ने कहा कि अगर कोई पढा लिखा नहीं तो क्या वह काम नहीं कर सकता। समाज के काम करने के लिए पढा लिखा ही बेहतर हो सकता है क्या। ऐसे में तो अब सरपंच भी सरकार ही चुनेगी। यही सवाल उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपनी वकील कीर्ती सिंह के जरिए रखे। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे आर्डर जारी किए हैं।
कमलेश ने कहा वह दो बार चुनाव लड़ चुकी है। वर्ष 2004 में सरपंच पद का और पिछली बार ब्लाक समिति सदस्य का चुनाव लड़ा था। ब्लाक समिति सदस्य का चुनाव वह करीब 15 वोटों से हार गई थी। इस बार उन्हें जीत की पूरी उम्मीद थी। क्षेत्र के लोगों ने उन्हें पंचायती उम्मीदवार बनाने का फैसला लिया था। नई शर्तों के चलते वह नामांकन की दौड़ से ही बाहर हो गई।
पिछले पंद्रह साल से समाजसेवा कर रही हूं। सरकार ने आनन फानन में ऐसी शर्त तय कर दी जिससे दलित वर्ग की 83 प्रतिशत महिलाएं चुनाव की दौड़ से बाहर हो गई। सामान्य वर्ग की 71 प्रतिशत महिलाएं चुनाव नहीं लड़ पाएंगी। सामान्य वर्ग के 55 प्रतिशत लोग चुनाव प्रक्रिया से बाहर हो गए हैं।
वेदवंती ने भी दी थी चुनौती.... इससे पहले हाईकोर्ट में हिसार के मुकलान गांव की 7 वीं पास वेदवंती देवी ने चुनाव लडने के लिए शैक्षिक योग्यता की शर्त के फैसले को चुनौती दी थी। जिसमें हाईकोर्ट से राहत नहीं मिल सकी। उस मामले में अगली सुनवाई 8 अक्तूबर है।
शैक्षिक अनिवार्यता पर लगाई रोक, नोटिस जारी किया
पंचायती राज संशोधन अधिनियम के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को बड़ा झटका दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत चुनाव लड़ने के लिए सामान्य वर्ग को 10वीं और अनुसूचित जाति व सामान्य महिलाओं के लिए आठवीं पास होने की अनिवार्यता पर रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने इस संबंध में हरियाणा सरकार को नोटिस भी जारी किया है।
हरियाणा सरकार को झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाल में पंचायत चुनाव को लेकर बनाए गए नए अधिनियम पर रोक लगा दी। न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ ने हरियाणा पंचायती राज (संशोधन) अधिनियम, 2015 पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए जवाब दाखिल करने के लिए कहा है।
याचिका चुनाव लड़ने की इच्छुक कुछ महिलाओं ने दाखिल की थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों ने पीठ से कहा कि मनोहर लाल खट्टर सरकार के नए अधिनियम से समाज का एक बड़ा समूह चुनाव नहीं लड़ पाएगा। इसका असर सबसे अधिक गरीब लोगों पर पड़ेगा।
जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक, इन नए मापदंड के कारण हरियाणा में सामान्य श्रेणी की 72 फीसदी और अनुसूचित जाति की 83 फीसदी महिलाएं चुनाव लड़ने की योग्यता नहीं रखतीं। वहीं अनुसूचित जाति के 71 फीसदी और सामान्य श्रेणी के 56 फीसदी पुरुष चुनाव नहीं लड़ सकते।
याचिका में कहा गया था कि यह अधिनियम अलोकतांत्रिक और मनमाना है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील संजय पारिख ने बताया कि चूंकि शीर्ष अदालत ने नए अधिनियम पर रोक लगा दी है, इससे साफ है कि अब चुनाव प्रक्रिया पर रोक लग गई है।
याचिकाकर्ताओं की दलील
शैक्षिक योग्यता: पंचायत चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले लोगों पर शैक्षिक योग्यता की शर्त क्यों लगाई गई जबकि सांसद, विधायक, केंद्रीय मंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं है।
कृषि ऋण अदायगी: कृषि ऋण अदायगी को अनिवार्य कर दिया गया है जबकि हरियाणा किसानों का प्रदेश है। देश भर के किसान फसल बर्बाद होने की वजह से परेशानी में रहते हैं। वे कृषि कार्यों के लिए ग्रामीण बैंकों से कर्ज लेते हैं। कृषि लोन देना सरकार की जिम्मेदारी है। कृषि ऋण अदायगी की शर्त रखकर सरकार बड़ी संख्या में किसानों को चुनाव लड़ने से वंचित रखना चाहती है।
बिजली बिल अदायगी: हरियाणा में 59 फीसदी ग्रामीण परिवार और 80 फीसदी एससी परिवार हर महीने 5000 रुपये से भी कम कमाते हैं। ऐसे में बिजली बिल नहीं चुकाने वाले को चुनाव लड़ने से वंचित करना गांव के गरीबों को सजा देने जैसा है। ऐसे लोगों की स्थिति इसलिए मजबूत नहीं हुई क्योंकि सरकार की नीतियां गलत हैं।
शौचालय: आजादी के इतने दिनों बाद भी अगर गांवों में लोगों के घरों में शौचालय नहीं है तो इसके लिए सरकार जिम्मेदार है। क्योंकि उनकी गलत नीतियों की वजह से वे आज भी गरीब हैं।
अब तक क्या-क्या हुआ
11 अगस्त- चुनाव लड़ने के लिए शैक्षिक योग्यता सहित पांच शर्तें तय की। 21 अगस्त- हिसार की वेदवंती की याचिका पर हाईकोर्ट ने शैक्षिक अनिवार्यता की शर्त पर रोक लगाई। 28 अगस्त- हाईकोर्ट ने शैक्षणिक योग्यता की शर्त पर रोक बरकरार रखी। सरकार ने जवाब दिया कि अब विधानसभा में विधेयक लाया जाएगा। 7 सितंबर- विधानसभा में विधेयक को मंजूरी दे दी। अजा महिला की पंच के लिए शैक्षक योग्यता पांचवी निर्धारित की। 10 सितंबर- पंचायती राज एक्ट में संशोधन को कानून बनाने को हिसार की वेदवंती ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। 14 सितंबर- हाईकोर्ट ने पंचायत चुनाव में शैक्षिक योग्यता तय किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर रोक से इंकार किया।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि हरियाणा सरकार 10 वीं पास होने और शौचालय होने की शर्त नहीं थोप सकती। अदालत ने इसे संविधान के खिलाफ माना है। इसलिए अदालत का निर्णय ही सर्वमान्य होगा। इसी आधार पर पंचायत चुनाव हो सकेंगे। सरकार के कानून द्वारा निर्धारित व्यवस्था के आधार पर नामांकन नहीं होगा। जिन प्रत्याशियों के नामांकन इसके चलते खारिज हुए होंगे, उन्हें भी चुनाव लड़ने का अवसर देना होगा। - जस्टिस वीएन खरे, पूर्व प्रधान न्यायाधीश
उच्त्ततम न्यायालय द्वारा पंचायती चुनावों में शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य किए जाने पर रोक लगाना स्वागत योग्य कदम है। सरकार के फैसले से 70 प्रतिशत जनता चुनाव लड़ने से वंचित रहेगी जो कि भारतीय संविधान द्वारा प्रदत अधिकार की सीधी अवहेलना है। - अशोक अरोड़ा, प्रदेशाध्यक्ष, इनेलो
प्रदेश सरकार पंचायत चुनाव में शैक्षिक योग्यता निर्धारित करना चाहती थी तो वह अगले चुनाव में करती। सुप्रीम कोर्ट के चार सप्ताह में जवाब मांगे जाने से सरकार की मंशा पूरी हो गई है। अब लंबे समय तक पंचायतों की डोर प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ में रहेगी। - भूपेंद्र सिंह हुड्डा, पूर्व मुख्यमंत्री