हरियाणा में पंचायत चुनाव का कार्यक्रम घोषित होने के साथ राजनीतिक दलों की प्रतिष्ठा का आंकलन शुरू हो गया है। राज्य के प्रमुख राजनीतिक दल भले ही पार्टी सिंबल पर चुनाव न लड़ने का दावा कर रहे हों, लेकिन चुनाव के बाद जनाधार की हकीकत सामने आ जाएगी।
हरियाणा की ग्यारह माह पुरानी भाजपा सरकार को नापतोल के चश्मे से देखना शुरू कर दिया गया है। गांव की चौपाल पर चौधर जमाने के लिए हरियाणा में सभी राजनीतिक दलों को अपनी ताकत झोंकनी पड़ेगी। पंचायत चुनाव में शैक्षणिक योग्यता का फैसला कर भाजपा ने जो संदेश दिया है उसका नतीजा 28 जनवरी को सामने आ जाएगा।
पढ़ी-लिखी ग्रामीण सरकार का सपना देख रही भाजपा आमतौर पर शहरी पार्टी मानी जाती है। इस चुनाव के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी गांवों में अपना जनाधार तलाश करेगी। हालांकि, भाजपा ने पिछले ग्यारह माह के कार्यकाल में ग्रामीण क्षेत्रों के विकास पर फोकस किया है।
ग्राम सचिवालय उसी रूपरेखा का अंश हैं। चुनाव घोषणा से पहले मुख्यमंत्री ने सत्ता और संगठन के लोगों से मंत्रणा कर चुनावी रण में कूदने के दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं।
इनेलो के लिए अहम है चुनाव
विधानसभा चुनाव में नेता प्रतिपक्ष की सीट हासिल कर चुकी इनेलो के लिए यह चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हैं। गांव के जनाधार को बचाना पार्टी केलिए चुनौती से कम नहीं है। चुनाव घोषणा से पहले ही इनेलो के नेता भाजपा व अन्य राजनीतिक दलों को यह चुनाव पार्टी चिन्ह पर लड़ने की चुनौती देते रहे हैं।
अंतर्कलह से जूझ रही कांग्रेस
विधानसभा चुनाव में तीसरे नंबर पर आई कांग्रेस की परफार्मेंस पंचायत चुनाव में देखने का विषय होगी। पार्टी के अंदर की कलह से जूझ रही प्रदेश कांग्रेस मतदाताओं को क्या संदेश देगी, यह अहम सवाल है।
अभी तक पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर और विधायक दल की नेता किरण चौधरी में कोल्डवार चल रही थी। अब पूर्व मंत्री कैप्टन अजय यादव भी अलग सुर अलाप रहे हैं।