हरियाणा की देशवाली बेल्ट में पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा के दुर्ग में कांग्रेस को मात देने के लिए भाजपा को संगठन और हारे हुए दिग्गज नेताओं पर भरोसा है। जजपा, इनेलो और आप के लिए यहां राह आसान नहीं हैं। 14 हलकों में से 11 पर कांग्रेस और दो पर भाजपा का कब्जा है।
हरियाणा की देशवाली बेल्ट के मतदाता काफी मुखर हैं और राजनीति की बारीकियों को बहुत अच्छे से समझते हैं। यहां के मतदाताओं की खासियत यह है कि एक बार जिस नेता का हाथ पकड़ लिया तो उसको छोड़ते नहीं है। दौर चाहे कैसा भी या फिर कोई लहर हो।
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पिछले दस साल में हुए चुनावों में यहां के मतदाताओं ने मोदी लहर और 75 पार नारे को खुले रूप से चुनौती दी और अपने नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा का झंडा बुलंद किया था। आज भी इस धरती पर यही स्थिति है। यहां न तो कोई मुद्दा है और न ही विकास की बात है, बात केवल और केवल एक है चौधर।
हुड्डा के समय दस साल तक यहां के लोग सत्ता का मजा चख चुके हैं। इसी चौधर के नारे से फिर से हुड्डा को तीसरी बार सीएम बनने की आस है। वहीं, हुड्डा के इस मजबूत दुर्ग को भेदने के लिए भाजपा को अपने मजबूत संगठन से आस है। भाजपा यहां गैर जाट राजनीति की रणनीति के तहत आगे बढ़ रही है।
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इस बेल्ट पर कांग्रेस और भाजपा में सीधी टक्कर है, इसलिए जजपा, इनेलो, बसपा और आम आदमी पार्टी के लिए यहां सियासी जमीन तलाशना इतना आसान नहीं है। तीन जिलों रोहतक, झज्जर और सोनीपत से मिलकर बनी इस बेल्ट में कुल 14 विधानसभा सीटें आती हैं। यहां कांग्रेस के पास 11 विधायक हैं।
हरियाणा की देशवाली बेल्ट के मतदाता काफी मुखर हैं और राजनीति की बारीकियों को बहुत अच्छे से समझते हैं। यहां के मतदाताओं की खासियत यह है कि एक बार जिस नेता का हाथ पकड़ लिया तो उसको छोड़ते नहीं है। दौर चाहे कैसा भी या फिर कोई लहर हो।
पिछले दस साल में हुए चुनावों में यहां के मतदाताओं ने मोदी लहर और 75 पार नारे को खुले रूप से चुनौती दी और अपने नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा का झंडा बुलंद किया था। आज भी इस धरती पर यही स्थिति है। यहां न तो कोई मुद्दा है और न ही विकास की बात है, बात केवल और केवल एक है चौधर।
हुड्डा के समय दस साल तक यहां के लोग सत्ता का मजा चख चुके हैं। इसी चौधर के नारे से फिर से हुड्डा को तीसरी बार सीएम बनने की आस है। वहीं, हुड्डा के इस मजबूत दुर्ग को भेदने के लिए भाजपा को अपने मजबूत संगठन से आस है। भाजपा यहां गैर जाट राजनीति की रणनीति के तहत आगे बढ़ रही है।
इस बेल्ट पर कांग्रेस और भाजपा में सीधी टक्कर है, इसलिए जजपा, इनेलो, बसपा और आम आदमी पार्टी के लिए यहां सियासी जमीन तलाशना इतना आसान नहीं है। तीन जिलों रोहतक, झज्जर और सोनीपत से मिलकर बनी इस बेल्ट में कुल 14 विधानसभा सीटें आती हैं। यहां कांग्रेस के पास 11 विधायक हैं।
जाट, सैनी, अग्रवाल और पंजाबियों का प्रभाव
इस पूरी बेल्ट पर जाटों का दबदबा है। सभी 14 सीटों पर वे हमेशा से निर्णायक भूमिका में रहे हैं। हालांकि, शहरी सीटों पर पंजाबी और अग्रवाल समुदाय भी बहुतायत में है। रोहतक सिटी में पंजाबी, सोनीपत सिटी में अग्रवाल वोट बैंक अहम रोल अदा करता है। झज्जर में अनुसूचित जाति के भी अच्छी खासी संख्या में वोट हैं। गोहाना में सैनी और बरोदा में ब्राह्मण और ओबीसी वोट बैंक प्रभावी है।
बड़ा मुद्दा : चाहिए चौधर और सरकारी नौकरी
यहां सबसे बड़ा मुद्दा चौधर का है। दस साल प्रदेश में अपनी चौधर चला चुके यहां के लोगों को फिर से सत्ता की उम्मीद है। इस बार भी इसी चौधर के नारे से कांग्रेस और खासकर भूपेंद्र सिंह हुड्डा को इस इलाके से खासी उम्मीद है। हुड्डा राज में रोहतक, सोनीपत और झज्जर का खूब विकास हुआ।
कई बड़े संस्थान भी यहां खुले और सड़कों का जाल बिछाया गया। इसके अलावा, सरकारी नौकरियां भी खूब मिली। यहां के युवाओं में सरकारी नौकरी के प्रति खासा क्रेज है। इसका अंदाजा इस बात ये भी लगाया जा सकता है कि अब भी काफी संख्या में लोग नौकरियों के लिए नेताओं के दरबार में हाजिरी लगाते हैं।