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खेलों में हरियाणा गाड़ रहा झंडे, पंजाब के खिलाड़ी पड़ रहे ठंडे...वजह एक नहीं बल्कि ये 2 हैं

Sat, 10 Nov 2018 03:21 PM IST
संजीव पंगोत्रा, अमर उजाला, चंडीगढ़
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नीरज चोपड़ा - फोटो : Getty
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एथलेटिक ट्रैक पर गिरते पड़ते भागते खिलाड़ी....एथलेटिक ट्रैक भी ऐसा कि जिसमें भागना भी असंभव। उस पर दुनिया से मुकाबला करने का जज्बा क्या संभव है। शायद नहीं, कुछ ऐसा ही चंडीगढ़ और पंजाब के एथलीट के साथ। बेशक हरियाणा के खिलाड़ी अपने दम और सरकार के प्रयासों से अब देश का नाम रोशन करने लगे पर अभी तक हरियाणा अपने पड़ोसी राज्यों के लिए प्रेरणा स्रोत नहीं बन सका।
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पंजाब के युवाओं का हाल तो बेहाल है। नशे से बुरा हाल है ही,साथ ही न तो इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध है और न ही उनका मार्ग दर्शन करने वाले। वहीं हरियाणा के लगभग हर घर में अभिभावकों के बीच अपने बच्चों को एक बेहतर खिलाड़ी बनाने केलिए कड़ी प्रतिस्पर्धा चल रही है। इनमें पहलवान, मुक्केबाज, कबड्डी,एथलेटिक्स के प्लेयर परचम लहरा रहे हैं।

सरकार भी इन खिलाड़ियों पर मेहरबान हैं। एशियन गेम्स हो या फिर ओलंपिक गेम्स मेडल जीतने पर पंजाब केमुकाबले हरियाण के खिलाड़ियों को कहीं अधिक कैश प्राइज देकर सम्मानित किया जाता हैं।
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चीन अमेरिका से मुकाबला कैसे करेंगे

neeraj chopra
भारत इंटरनेश्नल लेवल पर एथलेटिक्स में चीन और अमेरिका का मुकाबला करना चाहता है लेकिन उन देशों के मुकाबले हमारे पास इंफ्रास्ट्रक्चर लगभग न के बराबर हैं। भारत में एक भी इंडोर एथलेटिक्स स्टेडियम अभी तक नही बन पाया है। वहीं देश में एक भी हाई एलटीट्यूड संस्थेटिक ट्रैक नहीं है। जहां पर हमारे खिलाड़ी अभ्यास कर सकें।

भारत के मुकाबले चीन में इतना मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर है कि आप सोच नहीं सकते। चीन में बीजिंग स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी है जहां से पूरे देश केलिए हर साल 50 प्रतिशत खिलाड़ी तैयार हो रहे हैं। हांग चोऊ में काफी बड़ा इंडोर स्टेडियम है जहां पर 200 मीटर का एथलेटिक्स ट्रैक के साथ 400 मीटर के 2 ट्रैक भी है। जहां पर बर्फ में भी खिलाड़ियों के अभ्यास में दखल नही दे पाती।

ट्राइसिटी में एक भी सिंथेटिक ट्रैक नहीं

Asian Para Games 2018
इंटरनेशनल लेवल पर कंपीटीशन में हिस्सा लेने के लिए सिंथेटिक ट्रैक होना चाहिए। खुद उड़नसिख केनाम से जाने वाले मिल्खा सिंह के शहर (चंडीगढ़) में आज तक एक भी सिंथेटिक ट्रैक नही है।  ट्राइसिटी केप्लेयर्स के लिए यह किसी सदमे से कम नही हैं। मिल्खा सिंह जब  चंडीगढ़ में बतौर डॉयरेक्टर स्पोर्ट्स का पद पर थे तब उन्होंने सरकार से कई बार ट्राइसिटी के लिए सिंथेटिक ट्रैक की डिमांड रखी थी,लेकिन उनका यह सपना आज तक पूरा नही हो पाया।

चंडीगढ़ में सेक्टर 7 स्थित स्पोर्ट्स कांपलेक्स में एथलेक्सि का ग्राउंड जो जरूर है लेकिन वह भी सिंडर ट्रैक है। जोकि इंटरनेशनल लेवल के मुकाबले कही नही ठहरता। वहीं चीन और अन्य देशों में स्कूल लेवल पर ही सिंथेटिक ट्रैक उपलब्ध है। जिससे ग्रास रूट लेवल पर खिलाड़ी तैयार हो रहे हैं।

 
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एक्सपर्ट की राय

commonwealth games 2018
- हमारे देश में एथलेटिक्स का इंफ्रास्ट्रक्चर न के बराबर है। हाल ही में एशियन गेम्स में जो मेडल आए हैं वह खिलाड़ियाें की अपनी मेहनत के दम पर आए हैं। इंटरनेशनल लेवल पर कंपीटीशन में हिस्सा लेने वाले हरियणा में 10 - 12 सिंथेटिक कोर्ट है, वहीं कई बड़े राज्याें में एक से अधिक ट्रैक ही नही हैं- राज कुमार , एथलेटिक्स हरियाणा सेक्रेटरी

- भारत में एथलेटिक्स के कोचों की कोई कमी नहीं है,वह अपना काम बखूबी निभा रहे हैं। कमी है तो बस इंफ्रास्ट्रक्चर की। ग्रास रूट पर हमें पहले से कहीं अधिक काम करने की जरूरत है। वहीं यूटी में अभी तक खेल नीति नहीं बन पाई है। खिलाड़ियों को नौकरियां भी नहीं मिल पाती।
- रविंदर चौधरी,एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के उप प्रधान रविंदर चौधरी

- अगर बेहतर सुविधाएं मिलेंगी तो रिजल्ट अपने आप ही अच्छे आएंगे। ग्रास रूट से ही हमें खिलाड़ियों का चयन करना होगा। वहीं यूटी में एक भी एथलेटिक्स की अकादमी नहीं है जहां पर हम बच्चों को तैयार कर सकें। यहां पर सेक्टर 7 में एथेलटिक्स का सिंडर ट्रैक तो है लेकिन हमें सिंथेटिक कोर्ट की डिमांड है जिस पर इंटरनेशनल लेवल के खिलाड़ी तैयार होते हैं।
- सीनियर एथलेटिक्स कोच रिटायर्ड, शिव कुमार जोशी
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