विवि के अनुसंधान निदेशक डॉ. एसके सहरावत ने बताया कि इस किस्म की खासियत यह है कि इसकी फसल कम अवधि (लगभग 123 दिन) में पककर तैयार हो जाती है। यह हरे पत्रक एवं सफेद फूलों वाली बौनी किस्म है व इसके दाने पीले-सफेद (क्रीम) रंग के मध्यम आकार व थोड़ी झुर्रियों एवं हल्के बेलनाकार होते हैं।
इसके पौधे सीधे बढ़ने वाले होते हैं, इसलिए फलियां लगने के बाद गिरते नहीं हैं, जिससे इसकी उत्पादकता नहीं घटती एवं कटाई भी आसान हो जाती है। इसके अलावा इसकी जड़ों में नत्रजन स्थापित करने वाली गांठें और नाइट्रोजीनेस गतिविधि बहुत अधिक होती है, जिस कारण इसकी पर्यावरण से नत्रजन स्थापित करने की क्षमता अत्यधिक है, जोकि इसके बाद ली जाने वाली फसलों के लिए भी लाभदायक है। इसकी औसत पैदावार 26-28 क्विंटल प्रति हेक्टेयर एवं अधिकतम पैदावार 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक आंकी गई है।
रोगरोधक क्षमता अधिक
यह किस्म सफेद चूर्णी, एस्कोकायटा ब्लाइट व जड़ गलन जैसे रोगों की प्रतिरोधी है एवं इसमें रतुआ का प्रकोप भी कम होता है। इस किस्म में एफिड जैसे रसचूसक कीट एवं फली छेदक कीटों का प्रभाव भी पहले वाली किस्मों की तुलना में बहुत कम होगा।
इन वैज्ञानिकों का योगदान
यह किस्म कृषि वैज्ञानिक डॉ. राजेश यादव के नेतृत्व में, डॉ. रविका, डॉ. नरेश कुमार और डॉ. एके छाबड़ा ने विकसित की है। इसमें डॉ. रामधन, डॉ. तरुण वर्मा एवं डॉ. प्रोमिल कपूर का भी विशेष योगदान रहा।