गुरदासपुर लोकसभा उप चुनाव में प्रचार अंतिम चरण में पहुंच चुका है। लेकिन इस हलके की नुमाइंदगी करने वाले राज्यसभा सदस्य प्रताप बाजवा अब तक नहीं आए हैं। सियासी माहिरों का मानना है कि चुनाव के समय गुरदासपुर से गैर-मौजूदगी सियासी तौर पर बाजवा के लिए नुकसानदायक भी साबित हो सकती है।
बाजवा गुरदासपुर सीट के कादियां विधानसभा हलके का प्रतिनिधित्व करते थे। 2009 में वह गुरदासपुर से सांसद बने। फिर उनकी पत्नी चरनजीत कौर बाजवा कादियां से विधायक बनीं। 2014 में बाजवा, विनोद खन्ना से हार गए। उन्हें राज्यसभा सदस्य बना दिया गया। कादियां से अब उनके भाई फतेह बाजवा विधायक हैं। सुनील जाखड़ की जगह अपनी पत्नी चरनजीत कौर बाजवा के लिए टिकट मांग रहे बाजवा का अब तक प्रचार को नहीं आना पहेली बना है। जाखड़ की उम्मीदवारी पर हाईकमान ने मोहर लगाई है। अगर बाजवा अपने ही परंपरागत हलके में जाखड़ के लिए प्रचार नहीं करते हैं तो उन पर बागी का लेबल लगेगा।
दूसरे, बाजवा के न आने से सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह गुट को बहुत नुकसान होता नहीं नजर आ रहा है। शुरूआत में जरूर परेशानियां आईं कि अगर बाजवा नहीं चले तो कैसे होगा। लेकिन कैप्टन के रणनीतिकार कैप्टन संदीप संधू ने सारी कमान संभाल ली। जाखड़ ने सभी हलकों का एक दौरा किया और सभी चल पड़े। बाजवा के भाई फतेह बाजवा समेत उनके सभी करीबी इस समय जाखड़ की खुल कर मदद कर रहे हैं। जिनमें रमन भल्ला, अमित विज, जोगिंदर पाल, अशोक चौधरी आदि शामिल हैं। आजाद चुनाव लड़े नरेश पुरी ने भी जाखड़ के समर्थन का एलान कर दिया है। अब बाजवा समर्थक गिने-चुने जिले के पदाघिकारी हैं, जो अभी तक नहीं चले हैं। जिनसे कैप्टन गुट को खास खतरा नहीं है। अगर बाजवा समर्थक विधायक नहीं चलते तो दिक्कत हो सकती थी। सियासी माहिरों का कहना है कि दशहरा बाजवा के लिए उपयुक्त मौका था। वह कैप्टन के साथ मंच सांझा न करते, लेकिन गुरदासपुर में किसी भी समागम में शामिल होकर उपस्थिति दर्ज करा सकते थे।