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भाजपा ने हुड्डा का गढ़ भेदा, इनेलो सिरसा में ही सिमटी

Fri, 29 Jan 2016 10:44 AM IST
हर्ष कुमार सलारिया/अमर उजाला, चंडीगढ़
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हरियाणा पंचायत चुनाव में पंचों-सरपंचों के नतीजों के बाद भाजपा सफलता के जो दावा कर रही थी, उसे जिला परिषद चुनाव के नतीजे में भी सत्तारुढ़ दल ने साबित कर दिया। सिरसा जिले को छोड़कर प्रदेश के अन्य सभी इलाकों में अधिकांश सीटों पर भाजपा समर्थित प्रत्याशी और सक्रिय कार्यकर्ता चुनाव जीतने में सफल रहे।
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खास बात यह रही कि भाजपा रोहतक में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के गढ़ में सेंध लगाने में कामयाब रही, हालांकि सिरसा में इनेलो अपना गढ़ बचाने में कामयाब रही। इस चुनाव में किसी भी दल ने सीधे हिस्सा नहीं लिया था, लेकिन भाजपा समेत सभी दलों ने अपने-अपने प्रत्याशियों के लिए चुनाव प्रचार में अहम भूमिका निभाई थी।

इन चुनावों में जीत का सीधा मतलब जिला परिषदों के चेयरमैन पद पर काबिज होना है, इसलिए सभी राजनीतिक दलों ने पर्दे के पीछे पूरी ताकत झोंक रखी थी। जिला परिषद चुनाव में भाजपा को दो बड़े झटके महेंद्रगढ़ और भिवानी में लगे हैं।
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महेंद्रगढ़ में भाजपा जिला अध्यक्ष चुनाव हारे, जबकि भिवानी में भाजपा नेता ओम प्रकाश मान व उनके भाई चुनाव हार गए। फिर भी प्रदेश के बाकी हिस्सों में मिली जीत ने डेढ़ साल पुरानी खट्टर सरकार केहौसले बुलंद कर दिए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के गढ़ रोहतक जिला परिषद में अब भाजपा का चेयरमैन बनना तय हो गया है। इस जिले की 14 में से 11 सीटों पर भाजपा का कब्जा माना जा रहा है।

सिरसा में इनेलो नेता अभय चौटाला की पत्नी कांता चौटाला तो चुनाव हार गईं, लेकिन उनकी हार में चौटाला परिवार का ही हाथ अधिक रहा। कांता चौटाला को उनके ही परिवार केसदस्य आदित्य चौटाला ने करीब 7000 मतों के अंतर से पराजित किया। फिर भी, पहली बार चुनाव में उतरे अभय चौटाला के पुत्र करण चौटाला जीत हासिल करने में सफल रहे। अब माना जा रहा है कि सिरसा जिला परिषद चेयरमैन की सीट पर इनेलो करण चौटाला को ही बैठाएगी।

अहमियत है जिप चेयरमैन पद की
जिला परिषद चुनाव में भले ही राजनीतिक दल अपने सिंबल पर नहीं लड़े, लेकिन उनकी जद्दोजहद का कारण यह है कि इस चुनाव में जीत से वह सीधे जिला परिषद की चेयरमैनी पर काबिज हो सकते हैं। आमतौर पर जिला परिषद के चेयरमैन को दो-तीन विधायकों के बराबर माना जाता है। जिला परिषद की बैठकों में भी विधायक और सांसद बतौर सदस्य ही शामिल होते हैं। जाहिर है, इस लिहाज से चेयरमैन का पद राजनीतिक दलों के लिए काफी अहमियत रखता है।
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