कृषि कानूनों के खिलाफ जो आंदोलन पिछले एक महीने से चल रहा है, उसका सबसे बड़ा आधार है किसानों की आशंकाएं। ये ऐसी आशंकाएं हैं, जिन्होंने अन्नदाता को आरपार की लड़ाई के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर कर दिया है। किसानों को इस बात की सबसे बड़ी आशंका है कि केंद्र द्वारा पारित किए गए तीनों कृषि कानूनों के बाद न तो सरकारी मंडियां रहेंगी और न ही एमएसपी (फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य)। कृषि योग्य जमीनों पर भी धीरे-धीरे बड़े कारोबारी घरानों का कब्जा हो जाएगा, इसी तरह की कई आशंकाओं ने किसानों को चिंता में डाल रखा है।
यही चिंता दिलोदिमाग में लेकर तीनों कृषि कानूनों को रद्द करवाने की जिद पकड़े करीब चालीस किसान संगठन हजारों आंदोलनरत किसानों के साथ दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले हुए हैं।
दूसरी ओर, सरकार ने अब इन्हीं आशंकाओं के सच और झूठ से पर्दा उठाने का बीड़ा उठाया है। इसके लिए केंद्र व राज्य सरकार किसानों तक अपनी बात विभिन्न तरीकों से पहुंचा रही है। मगर इन प्रयासों के बावजूद किसानों और सरकार के बीच गतिरोध बरकरार है। नतीजतन पूरी मजबूती के साथ किसानों का धरना-प्रदर्शन आज भी जारी है।
सरकार ने किसानों से आग्रह किया है कि तीनों कृषि कानूनों को लेकर राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित कुछ लोगों द्वारा फैलाए जा रहे इस सफेद झूठ को पहचानें और इसे सिरे से खारिज करें। जिस सरकार ने किसानों को लागत का डेढ़ गुना एमएसपी दिया, जिस सरकार ने पिछले 6 साल में एमएसपी के जरिए लगभग दोगुनी राशि किसानों के खाते में पहुंचाई, वह सरकार एमएसपी कभी बंद नहीं करेगी। एमएसपी जारी है और जारी रहेगा।
सरकार ने किसानों को बताने का प्रयास किया है कि एपीएमसी यानी एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी मंडियां कायम रहेंगी, क्योंकि एमपीएमसी मंडियां इस कानून की परिधि से ही बाहर हैं। इसी तरह एग्रीमेंट फसलों के लिए होगा, ना कि जमीन के लिए। सेल, लीज और गिरवी समेत जमीन के किसी भी प्रकार के हस्तांतरण का करार नहीं होगा। विपक्ष द्वारा फैलाई जा रही इस बात का कि किसानों पर किसी भी प्रकार के बकाये के बदले कांट्रेक्टर्स जमीन हथिया सकता है, इस पर अपनी बात रखते हुए केंद्रीय कृषि नरेंद्र तोमर साफ कर चुके हैं कि परिस्थितियां चाहे जो भी हों, किसानों की जमीन सुरक्षित है।
साथ ही कांट्रैक्ट फार्मिंग में कृषि उपज का खरीद मूल्य भी दर्ज किया जाएगा। किसानों को यह भी बताया जा रहा है कि इन कानूनों के तहत भुगतान तय समयसीमा के भीतर करना होगा, अन्यथा कानूनी कार्रवाई होगी और जुर्माना लगेगा। किसान किसी भी समय बगैर जुर्माने के कांट्रैक्ट को खत्म कर सकते हैं। कई राज्यों ने तो किसानों के हित सुरक्षित रखने के लिए कांट्रैक्ट फार्मिंग को मंजूरी तक देते हुए कानून भी बना रखे हैं।
इसके अलावा सबसे बड़ी बात कि इन कानूनों को बनाने से पहले कोई सलाह-मशविरा या चर्चा नहीं की गई, इस पर सरकार किसानों को बता रही है कि इस पर दो दशकों तक विचार-विर्मश हुआ है। साल 2000 में शंकरलाल गुरु कमेटी से इसकी शुरुआत हुई थी। उसके बाद 2003 में मॉडल एपीएमसी एक्ट-2007 के एमपीएमसी रूल्स, वर्ष 2010 में हरियाणा, पंजाब, बिहार व पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों की समिति व 2013 में 10 राज्यों के कृषि मंत्रियों की संस्तुति, साल 2017 का मॉडल एपीएलएम एक्ट और आखिरकार 2020 में संसद द्वारा इन कानूनों को मंजूरी दी गई है।
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केएमपी, केजीपी पर होगा किसानों का ट्रैक्टर राउंड मार्च
आंदोलन के दौरान किसानों द्वारा अब केजीपी (कुंडली-गाजियाबाद-पलवल हाईवे) और केएमपी (कुंडली-मानेसर-पलवल हाईवे) पर शांतिपूर्वक ट्रैक्टर मार्च निकाला जाएगा। राष्ट्रीय किसान महासंघ के प्रवक्ता अभिमन्यु कोहाड़ ने बताया कि 30 दिसंबर को निकलने वाले इस मार्च में हजारों ट्रैक्टर इस हाईवे का राउंड मार्च निकालेंगे। दरअसल, ये हाइवे दिल्ली को दोनों ओर से घेरता है। इस मार्च का उद्देश्य भी एक तरह से केंद्र पर दबाव बनाना होगा।
सरकार को न्योता, किसान 29 को कर सकते हैं बैठक
किसान नेता अभिमन्यु कोहाड़ ने बताया कि किसान संगठनों ने केंद्र को चिट्ठी लिख दी है। इसमें केंद्र से कहा गया है कि किसान संगठन 29 दिसंबर को केंद्र से बातचीत कर सकते हैं। उनके अनुसार इस बैठक में किसानों की मांगें पूरी तरह मान ली जाती हैं, तो किसान आंदोलन खत्म हो जाएगा, अन्यथा आंदोलन को लेकर आगे की रणनीति तैयार होगी। इसके अलावा 27 और 28 दिसंबर को साहिबजादों के शहीदी दिवस के अवसर पर आंदोलनरत किसान दिल्ली की सीमाओं पर बैठकर समागम का आयोजन करेंगे। इस दौरान पंजाब से कीर्तनी और रागी जत्थों को दिल्ली बॉर्डर बुलाया गया है। इस दौरान विशाल लंगर भी बरताया जाएगा।