साल 2018 में पति-पत्नी के संबंधों पर दायर की गई याचिकाओं पर बेहद अहम फैसले सुनाए गए, जिनसे कइयों को झटका लगा तो कइयों को बड़ी राहत मिली। पढ़ें ऐसे ही 8 केस और फैसले...
दूल्हन के नाम पर 2 लाख की एफडी करवाए दूल्हा
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- फोटो : social media
दूल्हा-दूल्हन की याचिका पर सुनवाई करते हुए पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने दूल्हे को अहम फरमान सुनाते हुए उचित सुरक्षा देने को कहा है। होशियारपुर के एसपी को जोड़े को उचित सुरक्षा मुहैया करवाने के आदेश दिए गए हैं। हालांकि दूल्हन के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए दूल्हे को आदेश दिए कि वह अपनी पत्नी के नाम नेशनलाइज बैंक में 2 लाख की एफडी करवाए।
हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए होशियारपुर के एक प्रेमी जोड़ ने अपने परिवार वालों से जान का खतरा बताते हुए हाईकोर्ट से उचित सुरक्षा मुहैया करवाने की अपील की थी। याची ने कहा था कि वे दोनों बालिग हैं और शादी कर चुके हैं लेकिन घरवाले शादी के खिलाफ हैं। ऐसे में याचिकाकर्ताओं ने एसपी होशियारपुर को एक रिप्रेजेंटेशन देकर सुरक्षा की मांग की थी।
इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया तो याची ने हाईकोर्ट की शरण ली। हाईकोर्ट ने केस का निपटारा करते हुए एसपी होशियारपुर को याची की रिप्रेजेंटेशन पर फैसला लेने और आवश्यकता पड़ने पर उचित सुरक्षा मुहैया करवाने के आदेश दिए हैं। साथ ही कोर्ट ने कहा कि दूल्हा-दूल्हन दोनों कोर्ट में मौजूद हैं और ऐसे में लड़का बताए कि वह लड़की का पोषण करने और उसे खुश रखने में सक्षम है या नहीं।
याची द्वारा हां किए जाने पर हाईकोर्ट ने दूल्हे से पूछा कि क्या वह दूल्हन के नाम 2 लाख रुपए की एफडी करवाने के लिए तैयार है। इसपर दूल्हे ने कुछ समय मांगा। हालांकि कोर्ट ने तीन माह का समय देते हुए एफडी करवान इसकी प्रति हाईकोर्ट में सौंपने के आदेश दिए हैं।
शादी को सही ठहराने के लिए 7 फेरों को साबित करना बेहद जरूरी
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किसी भी शादी को वैध ठहराने के लिए हाईकोर्ट ने दो मानक बताए हैं, जिनके साबित होने के बाद ही शादी को सही ठहराया जाएगा। हाईकोर्ट के मुताबिक, किसी भी विवाह को वैध मानने के लिए हिंदू रीति रिवाजों के साथ उसका संपन्न होना जरूरी है और उसमें सात फेरे सबसे अहम हैं। सात फेरे साबित करने में नाकाम होने पर मैरिज सर्टिफिकेट को विवाह की वैधता साबित करने वाला सबूत नहीं माना जा सकता। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यह अहम आदेश कुरुक्षेत्र निवासी याची द्वारा पंचकूला जिला अदालत से जारी तलाक की डिक्री को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
याचिका दाखिल करते हुए कुरुक्षेत्र निवासी याची ने हाईकोर्ट को बताया कि वह प्रतिवादी पत्नी को चार साल से जानता था तथा वे दोनों एक दूसरे से प्यार करते थे। इसी बीच 18 फरवरी को पंचकूला के प्राचीन शिव दुर्गा मंदिर में शादी कर ली। इस दौरान प्रदीप शर्मा और मुकेश ने इस शादी की फोटो भी खींची थी। याची ने कहा कि विवाह समारोह के दौरान सिंदूर व सात फेरे दोनों संपन्न हुए थे।
याची ने मैरिज सर्टिफिकेट भी कोर्ट के समक्ष रखा और कहा कि यह सत्यापित करता है कि शादी वैध है। वहीं, प्रतिवादी पत्नी की ओर से कहा गया कि याची उसे प्राचीन शिव मंदिर में लेकर गया था लेकिन वहां पर सात फेरे नहीं हुए थे। इसके बाद वह याची के साथ एक दिन भी नहीं रुकी। याची ने उसे अपने प्रभाव में लेकर मैरिज सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर ले लिए थे।
इस पर याची ने कहा कि वह अपनी पत्नी के साथ दो दिन कुरुक्षेत्र में रुका था और इसके बाद लड़की के पिता उनके घर आए और शादी को अपनाने की बात कही। साथ ही यह भी कहा कि वे अपनी बेटी को घर ले जाना चाहते हैं ताकि विदाई समारोह के साथ उसे याची के घर भेज सकें। इसके बाद उन्होंने लड़की पर दबाव बनाया और शादी को खत्म करने के लिए कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी।
पंचकूला कोर्ट के तलाक के आदेशों पर लगाई मुहर
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुनाते हुए जिला अदालत द्वारा दिए गए तलाक के आदेशों पर मुहर लगाते हुए याचिका खारिज कर दी। याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि याची फोटो को सही प्रमाणित करने में नाकाम रहा और सात फेरे भी साबित नहीं कर पाया। इसके अभाव में केवल मैरिज सर्टिफिकेट को आधार मानकर शादी को वैध करार नहीं दिया जा सकता। हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार सातवें फेरे के बाद ही दो हिंदुओं का विवाह पूर्ण माना जाता है।
पति के रिश्तेदारों की प्रॉपर्टी पर दावा नहीं कर सकती पत्नी
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बहू द्वारा ससुर के फ्लैट पर किए गए दावे को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। साथ ही हाईकोर्ट ने बहू के अधिकारों को भी परिभाषित किया है। कोर्ट ने कहा कि पति द्वारा किराए पर लिया गया, उसका अपना या संयुक्त परिवार का जिसमें पति रह रहा हो केवल उसी घर में रहने के लिए पत्नी दावा कर सकती है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने बहू को ससुर का घर खाली करने के आदेश दिए है। याची का विवाह गुरुग्राम में हुआ था। विवाह के बाद दोनों अमेरिका चले गए थे। यूएसए से पत्नी आ गई थी और वह मायके में रह रही थी।
इसी बीच पति अमेरिका से अपना बिजनेस समेट कर गुरुग्राम आ गया और पिता के घर में पत्नी के साथ रहने लगा। कुछ समय बाद पति-पत्नी के बीच संबंध खराब हो गए। पत्नी ने पति और मेरठ में रह रहे सास-ससुर के खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला दर्ज करवा दिया। साथ ही जिस फ्लैट में महिला पति के साथ रह रही थी, उससे न निकाले जाने की अर्जी दी। अर्जी को मंजूर करते हुए निचली अदालत ने उसे फ्लैट से निकालने पर रोक लगा दी।
हाईकोर्ट में जब यह मामला सुनवाई के लिए आया तो पत्नी की ओर से कहा गया कि इस फ्लैट में वह पति के साथ रहती है। इस लिए यह फ्लैट डोमस्टिक वॉयलेंस एक्ट के सेक्शन-2 के तहत शेयर्ड हाऊसहोल्ड की श्रेणी में आता है। इस कारण उसे इस फ्लैट से निकाला नहीं जा सकता है। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि यदि वर्तमान परिभाषा को देखें तो पति के किसी भी रिश्तेदार के घर में यदि पत्नी उसके साथ कुछ दिन रहती है तो वह घर शेयर्ड हाऊसहोल्ड होगा।
आगे कानून को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी केवल उसी घर पर दावा कर सकती है जो पति ने किराये पर लिया हो या उसका अपना हो या पति अपने परिजनों के साथ रहता हो। बता दें कि इस मामले में पति अपने पिता के मकान में पत्नी के साथ रहता था। जबकि माता-पिता इस फ्लैट में कभी भी उनके साथ नहीं रहते थे। ऐसे में यह शेयर्ड हाऊसहोल्ड की श्रेणी में नहीं आता है।
सास-ससुर साथ नहीं रहे तो उनपर घरेलू हिंसा का आरोप नहीं बनता
इस मामले में सास-ससुर ने घरेलू हिंसा का मामला दर्ज करने को चुनौती दी थी। उनकी अपील को मंजूरी देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जब सास-ससुर कभी बहू के साथ रहे ही नहीं तो ऐसी स्थिति में उनके ऊपर घरेलू हिंसा का मामला नहीं बनता है। इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने दोनों के खिलाफ चल रही कार्रवाई को खारिज करने के आदेश दिए।
पत्नी के दूसरी शादी कर लेने से घरेलू हिंसा की शिकायत खत्म नहीं हो जाती
इस मामले मे सास-ससुर पर घरेलू हिंसा के मामले को तो हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। लेकिन पति को कोई राहत देने से इनकार कर दिया। पति ने कहा था कि उन दोनों के बीच तलाक हो चुका है और पत्नी ने दूसरी शादी कर ली है। ऐसे में अब घरेलू हिंसा मामले का कोई मतलब नहीं रह जाता है। कोर्ट ने कहा कि पत्नी की शादी से कार्रवाई पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। अपराध हुआ है या नहीं इसका फैसला न्यायालय को लेना है।
पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इंकार करना भी क्रूरता
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पत्नी द्वारा तलाक के लिए दाखिल की गई याचिका पर फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि पत्नी से मारपीट ही नहीं बल्कि उसको गुजारा भत्ता देने से इनकार करना भी उसके साथ क्रूरता है। इस टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने महिला की तलाक के लिए दायर की गई याचिका को मंजूर करते हुए डिवोर्स डिक्री उसके हक में जारी कर दी।
याचिका दाखिल करते हुए कपूरथला निवासी महिला ने कहा था कि उसका प्रेम विवाह 2005 में चंडीगढ़ में हुआ था। इसके बाद कुछ समय तो सब ठीक रहा लेकिन धीरे-धीरे उसके पति और ससुराल वालों का बर्ताव बदलने लगा। विदेश जाने के लिए उससे डेढ़ लाख रुपये की मांग की गई। विवाद बढ़ा और 2007 में उसे घर से निकाल दिया गया। इसके बाद उसने तलाक के लिए याचिका दाखिल की परंतु पति के अच्छे बर्ताव के आश्वासन के बाद वह घर वापस आ गई।
हालात सुधरे नहीं और उसे 2009 में फिर से घर से निकाल दिया गया। पीड़िता ने पुलिस को शिकायत दी और तलाक के लिए केस डाला लेकिन फिर शादी बचाने के लिए केस वापस ले लिया। अब याची ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। याची की दलीलों का विरोध करते हुए पति ने याची द्वारा परिजनों से अलग रहने के लिए दबाव बनाने और अक्सर झगड़ा करने की बात कही। साथ ही कहा कि बार-बार याचिका दाखिल की गई और वह इसकी आदी है।
हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि कोर्ट ने याचिका लंबित रहते पत्नी और बच्चों के गुजारे-भत्ते के लिए 5 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने के आदेश दिए थे और इन आदेशों का पति ने पालन नहीं किया। ऐसे में यह स्पष्ट होता है कि पति पत्नी के साथ क्रूर था। केवल मारपीट ही नहीं गुजारा भत्ता न देना भी क्रूरता की श्रेणी में आता है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने एक टिप्पणी भी की।
कहा गया कि महिलाओं का प्रयास रहता है कि शादीशुदा जीवन को जहां तक हो सके बचाया जाए। कारण आज भी हमारे समाज में तलाक को कलंक माना जाता है। जब परिस्थितियां बिलकुल ही बिगड़ जाएं तो ही महिला तलाक का रास्ता चुनती है। इस मामले में भी महिला ने दो बार तलाक की याचिका वापस ली है लेकिन हालात नहीं सुधरे। ऐसे में हाईकोर्ट ने तलाक की मांग को मंजूर करते हुए निचली अदालत द्वारा तलाक न देने के फैसले को खारिज कर दिया।
पत्नी खुद को संभालने में सक्षम तो गुजारे भत्ते की हकदार नहीं
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने गुजारे भत्ते को लेकर अहम आदेश जारी करते हुए यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि पत्नी खुद को संभालने में सक्षम है तो वह पति से गुजारे भत्ते की हकदार नहीं है। इस फैसले के साथ ही हाईकोर्ट ने फाजिल्का निवासी महिला की याचिका को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए महिला ने बताया था कि उसकी शादी जून 2010 में हुई थी। जून 2011 में वह ससुराल छोड़कर वापस अपने मायके आ गई थी।
याची ने कहा कि उसका पति बड़ा किसान है और इसके साथ ही उसकी डेयरी चलती है तथा फाइनेंस का काम भी है। उसका पति 1 लाख रुपये प्रतिमाह कमाता है। ऐसे में उसको पति से गुजारा भत्ता दिलवाया जाए। याची के पति ने हाईकोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ता सरकारी शिक्षक है और अक्तूबर 2011 में उसका वेतन 32 हजार रुपये था। उसकी पत्नी को पोलियो था और इस बात का खुलासा पहले नहीं किया गया था। शादी की रात में ही उसे पता चला की उसकी बीवी पोलियोग्रस्त है।
उसने बताया कि पत्नी ने गुजारे भत्ते के लिए निचली अदालत में याचिका दाखिल की थी जो खारिज हो गई। इसके बाद रिवीजन पिटीशन दाखिल की गई वह भी खारिज हो गई। अब याची ने हाईकोर्ट की शरण ली है। इसके जवाब में महिला ने कहा कि वह कमाती है, केवल इस आधार पर उसे गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि पत्नी का वेतन इतना कम नहीं है कि वह अपने आप को संभाल न सके। इसके साथ ही वह पति की कमाई एक लाख रुपये प्रतिमाह साबित करने में भी नाकाम रही। कोर्ट ने कहा कि गुजारा भत्ता मामलों में केवल पति की ही नहीं, बल्कि पत्नी की आय के साधन को भी ध्यान में रखना जरूरी है। ऐसे में पत्नी यह साबित करने में नाकाम रही कि वह अपने वेतन से खुद को संभालने में सक्षम नहीं है। हाईकोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ ही याचिका खारिज कर दी।
दूसरी पत्नी, पहली के रहते गुजारा भत्ते की हकदार नहीं
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पहली पत्नी से तलाक लिए बिना पुरुष से शादी करने वाली दूसरी पत्नी पहली के जीवित रहते गुजारा भत्ते पाने की हकदार नहीं है। हालांकि दूसरी पत्नी से पैदा हुई अविवाहित संतान भत्ते की हकदार जरूर होगी। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की जस्टिस जय श्री ठाकुर ने यह फैसला दूसरी पत्नी द्वारा गुजारा भत्ता के लिए दाखिल की गई याचिका को खारिज करते हुए दिया।
रोहतक में एक तांत्रिक की सलाह पर महिला ने अपनी बड़ी बहन के पति से शादी कर ली थी। पहला बच्चा विकृति के साथ पैदा हुआ था तो तांत्रिक ने उसे सलाह दी थी कि यदि वह दूसरा विवाह कर ले तो बच्चा सामान्य पैदा होगा। इसके बाद उसने बहन के पति से शादी कर ली। इस शादी के चलते उसे एक बेटी पैदा हुई। इस सब के बाद महिला ने गुजारा भत्ता के लिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर दी।
याचिका दाखिल करते हुए महिला ने कहा कि उसने बाकायदा शादी की है और इस नाते वह प्रतिवादी की पत्नी है और उससे गुजारा भत्ता की पूरी तरह से हकदार है। जस्टिस ठाकुर ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 में ‘पत्नी’ को परिभाषित नहीं किया गया है। यदि हम इसकी परिभाषा अन्य कानूनों में या सामाजिक तौर पर भी देखें तो कानूनी रूप से विवाहित पत्नी के अतिरिक्त किसी भी महिला को पत्नी नहीं माना जा सकता।
हिंदू विवाह कानून की धारा 5 में बताया गया है कि यदि दोनों में से किसी का भी जीवनसाथी जीवित नहीं है, तो वे किसी दूसरे से शादी कर सकते हैं। इस प्रकार कोई भी विवाह जिसमें इस प्रावधान का उल्लंघन किया गया है, वह अमान्य होगा। जस्टिस ठाकुर ने कहा कि यहां याचिकाकर्ता वह दूसरी पत्नी है, जो यह जानते हुए भी विवाह करती है कि पुरुष की पहली पत्नी जीवित है और उसने उससे तलाक भी नहीं लिया है। इसलिए वह धारा 125 के तहत तो गुजारा भत्ते ही हकदार नहीं है।
इसी के साथ जस्टिस ठाकुर ने कहा कि इस विवाह से पैदा हुई अविवाहित पुत्री गुजारा भत्ता प्राप्त करने की हकदार है। यह गुजारा भत्ता वह तब तक पाने की हकदार है जब तक उसका विवाह नहीं हो जाता या वह खुद को संभालने में समर्थ नहीं हो जाती। जस्टिस ठाकुर ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया कि वे पुत्री को गुजारा भत्ते की राशि तय करने के लिए रोहतक फैमिली कोर्ट में पेश हों।
परिस्थितियों को आधार बनाकर तलाक मंजूर किया जा सकता है
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने तलाक के एक मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। फैसला पलटते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही पत्नी के अप्राकृतिक संबंधों के आरोप साबित न हों फिर भी परिस्थितियों को आधार बनाकर तलाक मंजूर किया जा सकता है। ट्रायल कोर्ट ने पत्नी की उस दलील को मानने से इंकार कर दिया था जिसमें उसने कहा था कि उसका पति घिनौना व्यवहार करता है और उस पर अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने का दबाव डालता है।
ट्रायल कोर्ट ने यह दलील इसलिए नहीं मानी थी कि इसका कोई सबूत नहीं दिया गया था। इस पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि चाहे इसका कोई सबूत न दिया जा सकता हो, लेकिन इसके अलावा भी कई अन्य परिस्थितियों पर गौर किया जाना चाहिए। इस केस में पत्नी आठ वर्ष पहले ही एक बच्चे को साथ लेकर पति से अलग हो चुकी है।
कोई भी पत्नी अपने बच्चे सहित पति का घर तब तक नहीं छोड़ सकती जब तक ऐसे हालात पैदा न कर दिए गए हों। जिला अदालत में पत्नी की जब तलाक की अर्जी विचाराधीन थी तब उसने पति से किसी भी तरह का गुजारा भत्ता नहीं मांगा और आपसी सहमति से तलाक दिए जाने का आग्रह करती रही। हाईकोर्ट ने कहा कि जिला अदालत ने इस मामले में पत्नी की इन सभी परिस्थितियों पर गौर न कर उसके तलाक की अर्जी खारिज कर दी जो कि सही नहीं है।
यह सभी परिस्थितियां इशारा करती हैं कि पत्नी के साथ पति का व्यवहार बेहद ही क्रूर था और वह न सिर्फ पत्नी दहेज़ की मांग ही करता था बल्कि अपनी पत्नी के साथ बेहद ही घिनौने तरीके से पेश आता था। इस मामले में पत्नी को शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया है लिहाजा पत्नी की तलाक की अर्जी को स्वीकार किया जाता है।
पति भिखारी तो भी उसे पत्नी को गुजारा भत्ता देना होगा
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पत्नी को गुजारा भत्ता देने पर स्थिति स्पष्ट करते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम आदेश जारी कर कहा है कि यदि पति भिखारी हो तो भी उसे पत्नी को उसकी हैसियत के अनुसार गुजारा भत्ता देना होगा। हाईकोर्ट का यह आदेश छात्र होने और परिजनों पर आश्रित होने की दलील देते हुए पत्नी को गुजारा भत्ता देने में सक्षम नहीं होने की पति की दलील को खारिज करते हुए आया है।
गुरुग्राम निवासी पति ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए स्थानीय अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें कोर्ट ने उसे पत्नी को 18 हजार रुपये प्रतिमाह गुजारा भत्ता देने को कहा था। याची ने कहा था कि 12 मार्च 2013 को उसकी शादी हुई थी। लेकिन पत्नी का व्यवहार काफी उग्र था और एक दिन वह खुद घर छोड़कर चली गई।
हाईकोर्ट ने पति की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि याची बीटेक कोर्स करने की बात कहते हुए खुद को परिजनों पर आश्रित बता रहा है। वह फीस के तौर पर 60 हजार प्रति वर्ष भुगतान कर रहा है। ऐसे में यह स्पष्ट होता है कि वह मोटी फीस देने में सक्षम है। साथ ही शादी के समय ससुराल पक्ष ने उसे कार, गहने व अन्य सामान दिए थे। शादी पर लगभग 60 लाख खर्च हुआ था। कोई भी समृद्ध परिवार अपनी बेटी की शादी न कमाने वाले से नहीं करेगा।
ऐसे में यह स्पष्ट होता है कि याची घर की आय में योगदान कर रहा था। कोर्ट ने अपना फैसला लिखते हुए कहा कि शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्ति बिना किसी आय साधन वाली पत्नी को गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य है। भले ही पति भीख मांगता हो तो भी वह अपनी कमाई के अनुरूप गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य है। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि पति ससुराल द्वारा दी गई आर्टिका कार को मेंटेन कर रहा है तो आखिर कैसे माना जा सकता है कि उसकी आय का कोई साधन नहीं है। इस टिप्पणी के साथ ही हाईकोर्ट ने गुरुग्राम की अदालत द्वारा 5 सितंबर 2016 को जारी आदेश में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।