चंडीगढ़। कोरोना काल के दौरान फैले दुख के बीच बागवानी करके सुकून महसूस करता हूं। यह बात जीएमसीएच-32 के राजिंद्र सिंह चहल ने कही। उन्होंने बताया कि वह जीएमसीएच-32 में लैब टेक्नीशियन है।
उनका रोजाना मरीजों से सामना होता है। कोरोना के इस दुख भरे समय में हर इंसान पर मानसिक तनाव है, जिसे मैं बागवानी से कम कर रहा हूं। सुबह उठते ही मुझे अपने बगीचे में ही चाय चाहिए और शाम को आकर सबसे पहले बगीचा ही दिखता है।
उन्होंने बताया कि 2000 में जब वह यहां आए तो बागवानी शुरू की। आज उनके बगीचे में 200 से ज्यादा गमले हैं, जिसमें लगभग 60 रंगों के गुलाब खिल रहे हैं। इस कार्य में उनके परिवार और दोस्तों का पूरा सहयोग रहा है।
टाइगर गुलाब करता है आकर्षित
राजिंद्र ने बताया कि उनके बगीचे में कोलकाता और पुना दो प्रकार के पौधे हैं। कोलकाता प्रकार का गुलाब अपने पत्तों को फैला लेता है। वह पूरी तरह खिलकर बहुत ही सुंदर लगता है। वहीं पुना प्रकार का गुलाब बंद रहता है, लेकिन उसकी अपनी सुंदरता है। इन सबके अलावा टाइगर गुलाब हर इंसान को अपनी तरफ आकर्षित करता है। इसके पत्ते शेर की खाल की तरह दिखाई देते हैं। इस गुलाब के अलग-अलग रंग है।
14 प्रकार के चिकित्सा और 10 प्रकार के फलदार पौधे
राजिंद्र का कहना है कि उनके पास सहजन की फली, कपूर, गिलोय, लेमन ग्रास समेत 14 प्रकार के ऐसे पौधे हैं जिनसे दवाइयां बनती हैं। बारहमासी आम, पाकिस्तानी नींबू, चीकू, सेब, अंजीर समेत 10 प्रकार के फलदार पौधे हैं। इसके अलावा 5 तरह की सब्जियां और पान का पौधा, हींग, अजवाइन भी बगीचे में मौजूद हैं।
दादा से पोते तक बागवानी
राजिंद्र चहल ने कहा कि उनके दादाजी भारतीय सेना में थे। उसके बाद उनके पिताजी के भारतीय सेना में होने के कारण उन्हें अलग-अलग जगह पर रहने का मौका मिला। दादाजी को देखकर मेरे पिताजी की बागवानी में रुचि बढ़ी। उनको देखकर मैं भी बागवानी के प्यार में खो गया और अभी मेरा बेटा भी मुझे देख कर बागवानी करता है। उन्होंने कहा कि बागवानी करने में जो सुकून महसूस होता है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। अगर पौधों को बच्चों की तरह प्यार किया जाए, तो वे भी फूल, फल और सब्जियों के रूप में हमें प्यार वापस करते हैं।
माली की जरूरत ही नहीं पड़ती
उन्होंने बताया कि दादाजी के बाद पिताजी से बागवानी सीखकर अब माली की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती। जिस प्रकार एक मैकेनिक को वाहनों के पुर्जों का पता होता है, उसी प्रकार उन्हें भी बागवानी करने के हर पहलू की जानकारी है। दादाजी के समय में कभी माली को घर आते देखा था, पर पिताजी ने भी कभी माली की सहायता नहीं ली।