चंडीगढ़। पीजीआई में करीब दो साल बाद गैलियम-68 की आपूर्ति दोबारा शुरू होने जा रही है। इससे प्रोस्टेट कैंसर और न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर की जांच में मरीजों को बड़ी राहत मिलेगी। न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. अनीश भट्टाचार्य ने बताया कि इसकी सप्लाई के लिए कंपनी को ऑर्डर भेज दिया गया है और जल्द ही उपलब्धता बहाल होने की उम्मीद है। गैलियम-68 आमतौर पर जर्मेनियम-68/गैलियम-68 जेनरेटर से प्राप्त किया जाता है और इसकी नियमित उपलब्धता के लिए संस्थान में दो नए जनरेटर खरीदने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।
गैलियम-68 ट्रेसर की कमी के कारण पीजीआई में कई महत्वपूर्ण पीईटी/सीटी स्कैन प्रभावित हो रहे थे। यह रेडियोधर्मी समस्थानिक विशेष रूप से पीएसएमए और डोटाटेट स्कैन में उपयोग होता है जिससे कैंसर की बेहद सटीक पहचान संभव होती है। इसकी अर्धायु लगभग 67.8 मिनट होती है इसलिए इसे तुरंत उपयोग में लाना आवश्यक होता है।
विशेषज्ञों के अनुसार इस सुविधा के शुरू होने से न केवल जांच की गुणवत्ता बेहतर होगी बल्कि मरीजों को समय पर सस्ती जांच भी मिल सकेगी। वर्तमान में निजी अस्पतालों में इस जांच की कीमत 15 हजार से 30 हजार रुपये तक है जबकि पीजीआई में यह जांच पहली बार 7 हजार रुपये और फॉलोअप में छह माह के भीतर 3000 रुपये के बीच उपलब्ध थी। इसके अलावा गैलियम-68 की उपलब्धता से रेजिडेंट डॉक्टरों को भी आधुनिक तकनीक पर प्रशिक्षण मिलेगा जिससे उनकी विशेषज्ञता में वृद्धि होगी।
दो साल की देरी से मरीज और रेजिडेंट दोनों प्रभावित
मेक इन इंडिया की अनिवार्यता के कारण गैलियम-68 की खरीद करीब दो वर्षों तक बाधित रही। अंततः पीजीआई प्रशासन को मानक में ढील देते हुए विदेशी कंपनी को ऑर्डर देना पड़ा। इस दौरान जांच पूरी तरह ठप रही और मरीजों को महंगे दाम पर बाहर टेस्ट करवाने पड़े। वहीं रेजिडेंट डॉक्टर भी दो साल तक प्रैक्टिकल और रिसर्च के इंतजार में रहे। अब आपूर्ति बहाल होने से उन्हें राहत मिली है क्योंकि उनके पास सीखने के लिए सीमित समय बचा है।