चंडीगढ़। पंजाब यूनिवर्सिटी के यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज ने पुष्पांजलि ट्रस्ट के सहयोग से मानसिक स्वास्थ्य : जागरूकता और चुनौतियों पर सत्र का आयोजन किया। इस दौरान डीएसडब्ल्यू वुमन डॉ. सिमरत काहलों ने छात्रों से अपील की कि वे खुद को पहचानें और समझने की कोशिश करें। छात्रों के छोटे समूह बनाएं और एक-दूसरे से बातचीत करें। अगर छात्रावास या विभाग में कोई परेशानी होती है, वहां सदस्यों से अपनी बात साझा नहीं कर पाते हैं तो छात्र डीएसडब्ल्यू के साथ अपनी परेशानी साझा कर सकते हैं। छात्रों को अकेले तनाव नहीं लेना है। साथी छात्रों को भी मजाक बनाने की बजाय अपने दोस्तों की परेशानियों को समझना है जिससे हम बेहतर समाज बना सकें। इस दौरान मानसिक स्वास्थ्य पर आधारित पीयू के शोधार्थी की लिखी किताब ‘मानसिक रोगा नाल जान पहचान’ का विमोचन किया गया।
समाज के डर से मरीज समय पर नहीं करवा पाता इलाज : पीयू की एलुमनी और पीजीआई की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. आदर्श कोहली ने बताया कि पिछले 42 वर्ष से वे इस क्षेत्र में सेवाएं दे रही हैं। मानसिक बीमारियां बहुत तरह की होती हैं, पहले तो हमें उन्हें समझने की जरूरत है। जैसे कैंसर है, वैसे ही मानसिक बीमारी होती है। समाज ने अभी तक इसे स्वीकार करना शुरू नहीं किया है। वहीं किसी का मानसिक रूप से बीमार होना समाज में अभी भी अस्वीकार्य सा है, इसलिए मरीज बीमार होने के बावजूद घर में बैठे रहते हैं और समय पर इलाज नहीं करवा पाने के कारण बीमारी गंभीर हो जाती है। पीजीआई में भी इलाज के लिए आने वाले लोग थोड़ा हिचकते हैं कि उनके किसी रिश्तेदार या दोस्त को नहीं पता चल जाए कि वह मानसिक रूप से बीमार है।
समाज लोगों को समझने और स्वीकार करने में अक्षम
दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर डॉ. लल्लन ने अपना तर्जुबा साझा करते हुए बताया कि जब मैं 14 साल का था तो मुझे पता चला मैं अलग दिखता हूं। लोगों को कैंसर होता है, बुखार होता है, उन्हें सामने बताया जाता है यहां से इलाज करवाओ। मुझे लोग कोने में लेकर जाते थे और बोलते थे वहां एक बाबा है जो इसका इलाज करता है, वो जड़ी-बूटी खाओ, उस पानी में नहा लो... ठीक हो जाओगे। मुझे ल्यूकोडर्मा हो गया था, जो कि मेरे आस-पास के समाज के लोग स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। दरअसल ये ल्यूकोडर्मा मेरी त्वचा को नहीं हुआ है, हमारे समाज की सोच ल्यूकोडर्मा से ग्रसित है। हम जैसे हैं, अक्षम हैं, सक्षम हैं लोग इसे स्वीकार नहीं करते हैं। लोगों को समझने में हमारी समाज की सोच अक्षम हो गई है। हमें शिक्षक के तौर पर खुलने की जरूरत है, छात्रों से बातचीत करें, मानसिक तनाव का कलंक हमारे समाज की सोच में हैं, हमें इसे दूर करना होगा।
सत्र में छात्रों के लिए सुझाव
छात्र आपस में एक-दूसरे से बातचीत करें।
कोई भी छात्र शारीरिक-मानसिक किसी भी तरह से अक्षम हो, उसका मजाक नहीं बनाएं।
छात्रावास में एक-दूसरे की परेशानी का मजाक बनाने की बजाय दोस्तों की तरह सामने वाले को सुनें।
किसी भी तरह का मानसिक तनाव होने पर अपने अभिभावकों से चर्चा करें। अगर अभिभावकों के साथ बात नहीं कर पाते हैं तो शिक्षकों से परेशानी साझा करें।
मानसिक तनाव को कलंक की तरह नहीं लें, ये भी सामान्य बीमारी है, इसका समय पर इलाज करवाएं।