कामागाटा मारू जहाज को कनाडा से वापस भारत भेजने की घटना को आज सौ साल पूरे हो गए। इस त्रासदी के लिए माफी मांगने के बाद भले ही कनाडा ने मारे गए लोगों की याद में डाक टिकट जारी किया है लेकिन प्रथम विश्व युद्ध में शहीद होने वाला एक सिख फौजी ऐसा भी है जिसे उसने आज तक नहीं अपनाया।
वह कनाडा के लिए शहीद होने वाला पहला सिख था। वो जब तक लड़ा, अधिकारी उसे लंदन का ईसाई बताते रहे और जब शहीद हुआ तो बौद्ध बता दिया गया।
गूजर सिंह की कोई तस्वीर या चिट्ठी उसके पास नहीं
यह दास्तां है पंजाब के लाहौर (वर्तमान में पाकिस्तान) में जन्मे गूजर सिंह की। 1881 में जन्मे गूजर सिंह ने तीन साल तक पंजाब राइफल्स में नौकरी करने के बाद कनाडा के मोंटरियल में आर्मी ज्वाइन की। यहां वह विक्टोरिया राइफल्स की 24वीं बटालियन के बहादुर फौजी थे। उनकी शहादत के बाद कनाडा की ब्यूरोक्रेसी उन्हें पहचान देने में असमर्थ रही।
सेना के रिकॉर्ड के अनुसार, गूजर सिंह इंग्लैंड की चर्च से हैं और डेथ सर्टिफिकेट में उन्हें बौद्ध बताया गया है। कनाडा सेना के पास प्रथम विश्व युद्ध में लड़ने वाले सिख सैनिकों की कुछ ही तस्वीरें और उनसे जुड़ी चीजें हैं लेकिन गूजर सिंह की कोई तस्वीर या चिट्ठी उसके पास नहीं है।
यादगार पर राष्ट्रीय प्रतीक नहीं
बटालियन डायरी के अनुसार, 19 अक्तूबर, 1915 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान दुश्मन से लोहा लेते हुए गूजर सिंह शहीद हो गए।
इसके बाद बटालियन ने अपने कब्रिस्तान में उनके नाम का एक पत्थर लगा दिया लेकिन यह अन्य शहीदों की कब्र पर लगे पत्थरों से अलग है क्योंकि इस पर बाकियों की तरह कनाडा का राष्ट्रीय प्रतीक नहीं लगाया गया है। हालांकि उस पर गुरमुखी (पंजाबी लिपि) में श्री वाहेगुरु जी की फतेह लिखा हुआ है।
वाहेगुरु खुद मेरे अंदर: गूजर सिंह
कोट
लड़ते समय मुझे दुश्मन के अलावा कुछ ध्यान नहीं रहता। ऐसा लगता है जैसे वाहेगुरु खुद मेरे अंदर प्रवेश कर लड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हों।
-गूजर सिंह, बटालियन डायरी के अनुसार
सिख एक बहादुर कौम है। भारत में सिखों की केवल दो फीसदी आबादी है लेकिन सेना में 22 फीसदी सिख फौजी हैं। कनाडा की सेना में भी सिखों का अहम योगदान रहा है।
-प्रदीप सिंह नागरा, एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, सिख हेरिटेज म्यूजियम, कनाडा