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स्वतंत्रता दिवस विशेष: अब तक कलाई पर हैं ‘बंटवारे’ का दर्द...

Tue, 15 Aug 2017 08:47 AM IST
राजेश ढल्ल/अमर उजाला, चंडीगढ़
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Harmohan Dhawan
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चारों ओर मारधाड़...कत्लेआम...बर्बादी। ऐसे में बेस कैंप में जब तीन दिन के बासी आलू के परांठे मिले तो डूबता दिल थोड़ा संभला। ऐसे में कैसी खुशी। लगता था जिंदगी को एक दिन और मिल गया। यह आंखों देखा दर्द है उसी आजादी का जिसकी खुशी हम आज मना रहे हैं। यह दर्द देखा है चंडीगढ़ के पूर्व केंद्रीय मंत्री हरमोहन धवन ने। धवन की कलाई पर अभी बंटवारे का वह दर्द है जिसे देखते ही उन्हें याद आ जाता है वह खतरनाक मंजर।
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आजादी की खुशी की बात जुबां से निकलते ही धवन साहब की आंखों से सत्तर साल पुराना दर्द सामने आ गया। धवन ने बताया कि उस समय आजादी की खुशी से ज्यादा बंटवारे में बर्बादी का दर्द झेलना पड़ा। उस समय वे महज सात साल के थे। धवन उस समय अपने परिवार के साथ पाकिस्तान के फतेहगंज जिला कैंबलपुर में थे। वह बताते हैं कि वह मोहल्ले में रहने वाले सुनियारे के घर पर अपने पिता के साथ गए तो मंजर देखकर उनका दिल दहल गया। वहां बच्चों की लाशें पड़ीं थीं।

महिलाओं के क्षत- विक्षत शव पड़े थे। घर लौटे तो वह बीमार हो गए। दंगे का डर इतना ज्यादा था कि घर का दरवाजा बंद करके कनक की बोरियां लगा देते थे जिससे कि कोई दंगाई अंदर न आ सकें। घर छोड़ वाघा बार्डर आए तो ऐसा लगता था कि हालात सुधर जाएंगे और दो से तीन माह बाद वापस आ जाएंगे। 
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इस अजादी को महसूस करो...

Harmohan Dhawan
वाघा बार्डर में एक कैंप लगा था वहीं पर पापा, बड़ी बहन, मां के साथ शरण ली। वहां तीन दिन तक खाने पीने को कुछ नहीं मिला। तीन दिन बाद एक हैलीकाप्टर से खाने के पैकेट फेंके गए तो सभी भाग कर उसी ओर लपक लिए। लिफाफा हाथ में आया तो खुशी थी लेकिन जैसे ही खोला तो पराठों में दुर्गंध  थी। क्या करते जिंदा रहना था तो किसी तरह परांठे खाकर गुजारा कर लिया। 

वाघा बार्डर से जब ट्रेन से अंबाला आ रहे थे तो ट्रेन में पीने का पानी तक नहीं था। सामने स्टीम इंजन देखकर पिता ने कहा कि पानी की बूंदे टपक रही हैं वहीं से पानी पी लो। जब पानी पीने गया इंजन ने एकदम से गर्म भाप छोड़ दी जो कि हाथ पर लगी और कलाई झुलस गई, जिसके निशान आज भी हैं। धवन ने कहा कि अंबाला में ही जिंदगी की शुरुआत करने की सोची तो मां की कलाई से सोने का कड़ा लेकर बाजार में उसे बेचने के लिए पिता के साथ आए तो एक व्यापारी ने उसे सोने के कड़े को बेचकर 520 रुपये मिले। जिससे कारोबार शुरू किया गया।

धवन का कहना है कि लोगों को यह समझना चाहिए कि यह आजादी काफी दुख सह कर और कुर्बानी देकर मिली है ऐसे में इस बात को दिल में याद करके युवाओं को आजादी जीनी चाहिए। लेकिन कुछ लोग आजादी के गलत मतलब भी निकाल कर रहे हैं। उस समय जिन लोगों ने अपनी पत्नी, मां, बेटी और पिता खोया उन्हें भी याद करना चाहिए।
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