-भारतीय वायु सेना के पूर्व अफसर की समन आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
-40 साल सेना में रहकर देश की सेवा करने वाले के खिलाफ इस प्रकार की टिप्पणी अशोभनीय
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। भारतीय थल सेना के पूर्व उपाध्यक्ष को कायर कहकर संबोधित करने के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए मानहानि केस में समन आदेश के खिलाफ पूर्व वायु सेना अधिकारी की याचिका को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि अब यह केस निचली अदालत मेरिट के आधार पर निपटाएगी।
याचिका दाखिल करते हुए भारतीय वायु सेना के पूर्व अधिकारी विनोद कुमार गांधी ने मानहानि के मामले में उसके खिलाफ जेएमआईसी गुरुग्राम द्वारा जारी 7 नवंबर 2017 के समन आदेश को चुनौती दी थी। इसके साथ ही इस आदेश के खिलाफ उनकी अपील खारिज करने के एडिशनल सेशन जज के 15 सितंबर 2018 को जारी आदेश को भी रद्द करने की अपील की थी। याची ने कहा कि उस पर आरोप है कि उसने पूर्व थल सेना अध्यक्ष को लेकर ई मेल के माध्यम से आपत्तिजनक टिप्पणियां की हैं। याची ने कहा कि उसने जिन शब्दों का इस्तेमाल किया, वह शब्द शिकायतकर्ता की एसीआर में उसके वरिष्ठों ने दर्ज की है। ऐसे में वह आईपीसी की धारा 499 के तहत अपवादों की श्रेणी में आता है।
हाईकोर्ट ने सभी पक्षोंं को सुनने के बाद अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी को निर्भीक या आक्रामक नहीं माना गया तो इसका मतलब यह हो सकता है कि वह उतना आक्रामक नहीं हो सकता जितना कि युद्ध की परिस्थितियों में मांग की जाती है। इसका यह अनिवार्य रूप से नहीं है कि जिस व्यक्ति की बात की जा रही है, वह कायर है। याची द्वारा भेजे गए ईमेल में कायर शब्द के अलावा भी अन्य सामग्री भी है जो एक सम्मानित सेना अधिकारी और खास तौर पर जिसने लगभग 40 वर्षों तक देश की सेवा की है, उसकी प्रतिष्ठा के अनुरूप नहीं है। यहां तक कि कायर शब्द की परिभाषा के संबंध में यह भी देखना आवश्यक है कि क्या सामान्य व्यक्ति पर लागू होने वाला यह सामान्य अर्थ, रक्षा कर्मियों के विशिष्ट संदर्भ में भी लागू किया जा सकता है, जिनके लिए यह अधिक अपमानजनक हो सकता है। हाईकोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को मानहानि मामलों में समन जारी करते हुए यह देखना होता है कि प्रथम दृष्टया अपराध बन रहा है या नहीं। इसके बाद बाकी के तथ्यों पर केस के दौरान मेरिट पर फैसला होता है। इन टिप्पणियों के साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।