पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने महिला डाॅक्टर की याचिका पर फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि अस्वच्छ क्लीनिक में जबरन गर्भपात महिला की शारीरिक स्वायत्तता पर हमला है। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि संज्ञेय अपराध पर कार्रवाई करना पुलिस का दायित्व है और ऐसे में एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती। कुरुक्षेत्र निवासी डाॅक्टर रचना रैना ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए बताया कि पुलिस ने बिना अधिकृत अधिकारी की शिकायत के याची के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है।
कानून के अनुसार ऐसा नहीं किया जा सकता और ऐसे में एफआईआर को खारिज किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस के अधिकार गर्भ में लिंग जांच को लेकर सीमित हैं लेकिन संज्ञेय अपराध की स्थिति में कार्रवाई उनका दायित्व है। सांस्कृतिक और सामाजिक पूर्वाग्रहों के चलते लड़के के लिए प्राथमिकता की सोच को जन्म देता है और इसी का नतीजा है विषम लिंगानुपात। यह न केवल स्त्री द्वेष को बढ़ावा देता है बल्कि गर्भवती माताओं के स्वास्थ्य को भी खतरे में डालता है।
नैतिकता के नाते गलत होने के साथ ही यह समाज में लैंगिक असमानता को और बढ़ा देता है, जिससे असुरक्षित वातावरण बनता है, जो लैंगिक न्याय के लिए अनुकूल नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अस्वच्छ क्लीनिकों में जबरन व अवैध गर्भपात सीधे तौर पर महिलाओं के शारीरिक स्वायत्तता के अधिकार पर हमला है। इन टिप्पणियों के साथ ही हाईकोर्ट ने एफआईआर रद्द करने की मांंग को लेकर दाखिल उनकी याचिका को खारिज कर दिया।