कामर्शियल से ज्यादा आर्ट सिनेमा में दिखाई देने वाले राहुल बोस ने बताया कि वह पहले भारतीय होने पर शर्म महसूस करते थे।
बुधवार को लिटरेरी सोसाइटी की ओर से यूटी गेस्ट हाउस सेक्टर-4 में बातचीत में राहुल ने अपनी जिदंगी से जुड़े कई अहम पहलुओं पर रोशनी डाली।
इसमें उन्होंने बतौर एक्टर, राइटर, स्पोर्ट्समेन और सामाजिक कार्यकर्ता कई विषयों पर चर्चा की।
अपनी संस्था द फाउंडेशन के बारे में बताते हुए राहुल ने बताया कि हाल ही में उन्होंने 4,60,000 डालर जुटाए हैं। इसमें सचिन तेंदुलकर से लेकर जाकिर हुसैन ने अपनी कुछ कीमती चीजों को हमें दिया था।
इसकी नीलामी करके हमने यह रकम जुटाई। चार साल पहले जब यहां आया था तो अभिनव बिंद्रा ने अपनी गन दी थी जो 80 लाख में बिकी थी। आज भी जब उनके पास गया तो उन्होंने अपनी एक राइफल दी।
कभी नहीं सोचा था एक्टर बनूंगा
बचपन से इंग्लिश ही बोलता था और आस-पास जितने भी लोग थे वह भी इंग्लिश में ही बात करते थे। उस समय दोस्तों के बीच हिंदी फिल्में बिलकुल नहीं देखी जाती थी तो फिल्मों से थोड़ा दूर ही रहा। ग्रेजुएशन के समय यही सोचता की विदेश जाऊंगा और किसी नामी यूनिवर्सिटी में एडमीशन लूंगा।
विदेश की चर्चित यूनिवर्सिटी में एडमीशन का वक्त आया को सब जगह से रिजेक्ट हो गया। फिर एक साल का समय लेकर दोबारा तैयारी शुरू की और तब तक मुंबई के कालेज में एडमीशन ले लिया, लेकिन वहां जाने में शर्म महसूस होती थी। बिलकुल नहीं चाहता था कि भारत में पढ़ाई करूं।
अगले साल फिर से बाहर की यूनिवर्सिटी में रिजेक्ट हो गया। बाद में एक एडवरटाइजिंग एजेंसी में कॉपीराइटर की जॉब करने लगा और साथ ही थिएटर से जुड़ा। अंग्रेजी में थिएटर करते करते ही एक फिल्म में काम मिल गया जिसका नाम इंग्लिश अगस्त था। फिल्म कामयाब रही और फिर कॉपीराइटिंग की जॉब छोड़ फिल्मों में ही आ गया।
रग्बी भी खेला
राहुल के अनुसार उन्हें रग्बी खेलना स्कूल के समय से ही पसंद था। 1998 में जब भारत को पहली बार रग्बी खेलने के लिए इंटरनेशनल अनुमति मिली तो इसका हिस्सा बना। रग्बी खेल को प्रोत्साहित करने के लिए दो करोड़ रुपये दान भी करूंगा।
गुजरात दंगों ने हिलाया, बना सामाजिक कार्यकर्ता
पहले सामाजिक कार्य नहीं करता था, लेकिन 2002 में जब गुजरात दंगे हुए तो मन आहत हुआ। पहली बार एनजीओ गठित किया। इसमें धर्म से संबंधित गलत धारणा के खिलाफ सीख और महिलाओं को प्रोत्साहित करने की सोची।
2004 में सुनामी के बाद जब छोटे महाद्वीपों का हाल देखा तो हमने अपनी एनजीओ के कार्यों को बढ़ा कर कुदरत के संरक्षण में भी लगा दिया।