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पंजाब में अन्नदाताओं के सांसों की डोर पर भारी पड़ रहा कर्ज का बोझ

Sun, 08 May 2016 05:44 PM IST
राजीव शर्मा /अमर उजाला, लुधियाना
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खेत में किसान - फोटो : file photo
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देश को अनाज मामले में आत्मनिर्भर बनाने वाले पंजाब के अन्नदाताओं के सांसों की डोर पर भारी पड़ रहा कर्ज का बोझ। दरअसल हरित क्रांति के जरिए देश को अनाज संकट से निकालकर आत्मनिर्भर बनाने वाला पंजाब का अन्नदाता आज खुद संकट में फंसा हुआ है। पिछली तीन खराब फसलों ने किसान का आर्थिक गणित बिगाड़ दिया है।
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नतीजतन तीन साल में 35 हजार करोड़ का कर्ज उछल कर 69 हजार करोड़ से अधिक हो गया है। इसमें 52 हजार करोड़ बैंकों का और बाकी आढ़ती व अन्य वित्तीय संस्थानों का है। आमदनी में कमी और कर्ज का बढ़ता बोझ किसान की सांसों की डोर पर भारी पड़ रहा है।

2001 से लेकर 2011 तक पंजाब में 6992 किसानों ने आत्महत्या की। इस अवधि में हर साल करीब सात सौ किसानों ने मौत को गले लगाया। अब यह आंकड़ा बढ़ कर रोजाना तीन से चार तक पहुंच गया है। किसानों की आत्महत्याओं में पंजाब देश भर में महाराष्ट्र के बाद दूसरे नंबर पर पहुंच गया है। आत्महत्या करने वाले करीब अस्सी फीसदी छोटे (पांच एकड़ से कम जमीन वाले) या ठेके पर जमीन लेकर खेती करने वाले किसान हैं। औसतन 75 फीसदी किसान कर्ज से परेशानी के कारण जान दे देते हैं।
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डॉ. सुखपाल सिंह, हेड, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के इकोनोमिक्स विभाग ने बताया कि रबी और खरीफ की लगातार तीन फसल खराब होने के कारण ही किसान की आर्थिक हालत बिगड़ गई है। गेहूं पंजाब की सबसे संवेदनशील फसल है, यदि यह खराब होती है तो पंजाब का किसान पटरी से उतर जाता है। छोटे किसानों के लिए मौजूदा कृषि पैटर्न फिट नहीं है। किसान को आर्थिक भंवर से निकालने के लिए कृषि तकनीक और नीति में बदलाव करने होंगे।
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इस बार भी गेहूं का झाड़ कम रहने का अनुमान

farmer - फोटो : file photo
डॉ. सुखपाल ने बताया कि 2013-14 में गेहूं का झाड़ 50.17 क्विंटल प्रति हेक्टेयर था, जो मौसम की खराबी के कारण पिछले साल लुढ़क कर 42.94 क्विंटल तक सिमट गया। चालू सीजन में भी गेहूं का झाड़ 43 क्विंटल के आसपास ही रहने का अनुमान जताया जा रहा है।

जबकि 2011-12 में गेहूं की 50.97 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की रिकार्ड पैदावार हुई थी। सफेद मक्खी के हमले के कारण कॉटन की पैदावार भी 2014-15 में 5.43 क्विंटल प्रति हेक्टेयर से सिमटकर पिछले साल 2.23 क्विंटल प्रति हेक्टेयर पर रह गई।

देश भर में बढ़े, पंजाब में घटे छोटे किसान: पंजाब में 1991 में पांच लाख छोटे किसान थे, अब 3.60 लाख हैं। भारत में 11 करोड़ छोटे किसान थे, अब बढ़ कर 12 करोड़ हो गए। पंजाब में लाभ न होने के कारण छोटा किसान खेती से मुंह मोड़ रहा है। मौजूदा कृषि मॉडल बड़े किसानों को सूट करता है। पंजाब में कुल 10.53 लाख किसान हैं। इनमें से 3.60 फीसदी छोटे किसान सूबे की केवल नौ फीसदी जमीन पर खेती करते हैं, लेकिन उनको सब्सिडी का केवल आठ फीसदी हिस्सा ही मिलता है।

समाधान
- छोटे किसानों के लिए अलग से कृषि नीति बनाई जाए
- को-आपरेटिव फार्मिंग को बढ़ावा दिया जाए
- इस सैगमेंट के लिए फसल के अलग पैटर्न बनाए जाएं
- किसान की लागत कम करने के इंतजाम किए जाएं
- बीज और खाद सब्सिडी नीति अलग बनाई जाए
- छोटे किसान की मार्केटिंग में सहायता की जाए
- छोटे किसान को बूस्ट करने के लिए अलग से फंड रखा जाए, विशेष पैकेज दिया जाए
- सब्सिडी जमीन के बजाय परिवार को देनी होगी, इसके लिए प्रोग्रेसिव सब्सिडी का तरीका अपनाया जाए 
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