कुल 15 जगहों पर तोरणद्वार बनाए गए थे। करीब तीन घंटे तक लोग स्वागत में लगे रहे। कटला रामलीला मैदान में हुई इस सभा में वरिष्ठ साहित्यकार विष्णु प्रभाकर समेत कई प्रमुख लोग मौजूद थे। ऐसा ऐतिहासिक स्वागत देखकर ब्रिटिश अफसर भी हैरान थे। सुभाष चंद्र बोस के इस स्वागत को उस वक्त के अंग्रेजी अखबारों ने भी प्रमुखता दी।
सभा के बाद सुभाष चंद्र बोस धांसू व जुगलान गांव पहुंचे तो किसानों ने बताया कि सूखा के चलते तमाम घरों में फांकाकशी की नौबत है। ब्रिटिश सरकार की तरफ से मदद के बजाय किसानों से जबरन लगान वसूला जा रहा है। लोगों को यातनाएं दी जा रही हैं। द्रवित सुभाष चंद्र बोस ने हिसार में ही रात्रि विश्राम भी किया। पूरी रात बैठक व चर्चा होती रही।
रोजगारपरक पढ़ाई का दिया था संदेश
रात्रि विश्राम के बाद अगली सुबह सुभाष चंद्र बोस सातरोड गांव के विद्यालय में पहुंचे। इस विद्यालय का संचालन विद्या प्रचारिणी सभा कर रही थी। यहां पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को शिल्पकारी भी सिखाई जाती थी। बच्चों को रोजगारपरक शिक्षा लेते देखकर सुभाष चंद्र बोस काफी खुश हुए और संस्था के कार्यों की तारीफ करते हुए कहा था कि जब तक पढ़ाई के साथ-साथ रोजगार का भी प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा, तब तक शिक्षा का सही अर्थ नहीं निकलेगा। उन्होंने लोगों को रोजगारपरक शिक्षा के लिए प्रेरित किया था।
आजाद हिंद फौज में भी रही भूमिका
हिसार से लौटने के कुछ दिन बाद ही सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन शुरू किया था। चार जुलाई 1943 को जब आजाद हिंद फौज पूरी तरह से सक्रिय रूप में सामने आई तो उस वक्त हरियाणा से 398 अधिकारी व 2317 सिपाही भर्ती हो चुके थे। भोजराज गांव निवासी श्योराम, चिड़ौद निवासी शीशराम व सूरजभान, खेदड़ निवासी कैप्टन फतेह सिंह, मंढ़ोली कलां निवासी सूबेदार झंडू राम, श्रीराम, सुल्तानपुर निवासी छोटूराम, कुम्भा निवासी फूल सिंह, कंवारी निवासी रामेश्वरी, समैन निवासी रतिराम, घुड़साल निवासी गंगाजल और हसनगढ़ निवासी भालेराम समेत 539 लोग हिसार जिले के थे। इनमें से 61 अफसर व 478 सिपाही हिसार जिले के रहने वाले थे। नेताजी के बेहद करीबी भालेराम को रंगून में व्यक्तिगत सुरक्षा दस्ता में शामिल किया गया था।