हाईकोर्ट ने कहा कि संसद ने फैमिली कोर्ट को यह अधिकार दिया ही नहीं है। संसद ने उन्हें नाबालिगों के संरक्षण से संबंधित कार्यवाही से निपटने की अनुमति दी है। हाईकोर्ट ने कहा कि हमारे विचार से यह एक विवेकपूर्ण निर्णय है जहा एक त्वरित व कम औपचारिक प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक है।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि फैमिली कोर्ट को बच्चा गोद लेने की वैधता संबंधित प्रश्न पर निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। इस टिप्पणी के साथ ही बच्चे के चाचा की अपील को पंजाबा-हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।
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जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस रोहित कपूर की खंडपीठ एक व्यक्ति की अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने अपने भतीजे के संरक्षण की मांग की थी। इस मामले में फैमिली कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि वह गोद लेने की वैधता पर निर्णय नहीं ले सकते। याचिका मूलतः गोद लेने की वैधता को चुनौती देती थी।
इस फैसले से सहमति जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि संसद ने फैमिली कोर्ट को यह अधिकार दिया ही नहीं है। संसद ने उन्हें नाबालिगों के संरक्षण से संबंधित कार्यवाही से निपटने की अनुमति दी है। हाईकोर्ट ने कहा कि हमारे विचार से यह एक विवेकपूर्ण निर्णय है जहा एक त्वरित व कम औपचारिक प्रक्रिया का पालन किया जाना आवश्यक है। अपीलकर्ता का पहला तर्क कि अभिरक्षा और संरक्षकता से संबंधित मुद्दे में अनिवार्य रूप से गोद लेने से संबंधित मुद्दा भी शामिल है, क्योंकि गोद लेने के दस्तावेज के माध्यम से नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा व संरक्षकता प्रदान की जाती है। ऐसे में फैमिली कोर्ट को गोद लेने के मामलों में अधिकार क्षेत्र माना जाएगा। इस दलील में कोई दम नहीं है। वर्तमान मामले में चाचा ने 2019 में अपने भतीजे के संरक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए एक याचिका दायर की थी। यह नाबालिग के पिता के 2016 में निधन और उसकी मां के किसी अन्य व्यक्ति से विवाह करने के बाद हुआ था।