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घर में हैं बच्चे तो रखें खास ध्यान, कहीं आफत में न पड़ जाए उनकी जान...कुछ ऐसे रहें सावधान

Mon, 08 Oct 2018 01:20 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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अगर आपके घर में बच्चे हैं, तो बेहद सावधान रहने और उनका खास ध्यान रखने की जरूरत है। कहीं ऐसा न हो कि उनकी जान आफत में पड़ जाए और आप परेशान रहें। पिछले सप्ताह पानीपत में एक आठ महीने की बच्ची के गले में रबड़ की पौन इंच की गेंद फंस गई। परिजन उसे लेकर प्राइवेट हॉस्पिटल गए मगर उसकी जान नहीं बच पाई। छह महीने से तीन साल की उम्र तक के बच्चों के गले और नाक में छोटी-छोटी चीजों के फंसने के मामले अक्सर सामने आते हैं।
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पीजीआई में हर हफ्ते तीन से चार ऐसे केस आते हैं, जिसमें बच्चे के गले में मटर के दाने, राजमा, सिक्का और बटन की साइज के बराबर बैटरी या अन्य चीजें फंसी होती हैं। समय पर पहुंचने वाले बच्चों को तो बचा लिया जाता है, मगर जो बच्चे देरी से पहुंचते हैं या गले में फंसने के कारण सांस नहीं ले पाते, उनकी मौत तक हो जाती है। हादसों के लिहाज से छह महीने से तीन साल तक के बच्चों का यह दौर सबसे नाजुक होता है। इसका एक मात्र उपाय यही है कि पैरेंट्स को सावधानी बरतनी होगी।

बटन बैटरी सबसे ज्यादा खतरनाक
आजकल ऐसे खिलौने आ रहे हैं, जिसमें बटन के बराबर सेल होते हैं। इससे खिलौनों की लाइट जलती है। छह महीने-तीन साल के बच्चों में कोई भी चीज मुंह के अंदर डालने की उत्सुकता रहती है। अनजाने में वे बैटरी गटक लेते हैं। यदि देर तक अंदर रह जाए तो बटन बैटरी फूड पाइप को गला देती है। गले में फंसने से सांस लेना मुश्किल होता है। बच्चे की आवाज निकलना बंद हो जाती है। उल्टी आती है और लार बहती है। पेरेंट्स को ध्यान रखना होगा कि इस तरह का खिलौना न दें, जिसमें बटन के साइज के बराबर बैटरी हो। यदि देना है तो बैटरी निकालकर दें।
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मटर दाना, राजमा व सेप्टिक पिन खा लेते हैं बच्चे

डेमो - फोटो : डेमो
पीजीआई पीडियाट्रिक सर्जरी डिपार्टमेंट के पूर्व एचओडी डा. केएलएन राव ने बताया कि छोटे बच्चों में हर छोटी मुंह में डालने की उत्सुकता रहती है। इस चक्कर में वे हर कोई चीज में मुंह में डाल लेते हैं। बच्चे मूंगफली के दाने, सेप्टिक पिन, राजमा, मटर का दाना, सिक्का, बटन बैटरी और छोटी बॉल सहित अन्य चीजे मुंह में डाल देते हैं। कुछ बच्चे तो आधे घंटे में ही गंभीर हो जाते हैं तो कुछ बच्चे पांच दिन बाद भी ठीक रहते हैं। ये सब कुछ बच्चे और गटकने वाली चीजों पर निर्भर करता है।

बच्चे को लेटाकर कुछ न खिलाएं
पिछले दिनों पहले लखनऊ में भी एक ऐसा केस आया था, जिसमें एक मां नौ महीने की बच्ची को लेटाकर चम्मच से दूध पिला रही थी। दो तीन चम्मच दूध पीते ही उसे हिचकी आने लगी और साथ में सांस उखड़ने लगी। परिजन उसे अस्पताल लेकर पहुंचे लेकिन तब तक उसकी मौत हो चुकी थी। ऐसे में दो साल से कम उम्र के बच्चे को कभी लेटाकर न खिलाएं। बच्चे को पानी, दूध व खाद्य पदार्थ बैठाकर खिलाएं। बच्चा छोटा हो तो उसे दाहिने पर 45 डिग्री कोण पर बैठाकर खिलाएं-पिलाएं।

क्या करना चाहिए प्राथमिक उपचार
डा. केएल राव ने बताया कि यदि बच्चा कोई चीज गटक ले तो उसे पूरा उल्टा कर दें और उसके पीठ थपथपाएं। इससे कई बार गटकी चीजे निकल आती हैं और कोशिश कीजिए की जल्द से जल्दी बड़े अस्पताल पहुंचे। बड़े अस्पताल इसलिए कह रहा हूं कि छोटे अस्पतालों में इस तरह की सुविधा नहीं होती और अस्पतालों के चक्कर काटने पर समय काफी बर्बाद होता है जबकि ऐसे मामलों में एक-एक मिनट मायने रखता है। पीजीआई में तो हर हफ्ते तीन से चार केस आते हैं। पीजीआई में एंडोस्कोपी की मदद से इसे निकाला जाता है।

बच्चों को इन खतरों से भी बचाएं

baby - फोटो : सोशल मीडिया
दरवाजे में अंगुली फंसना
अक्सर बच्चों की उंगुली दरवाजे में फंस जाती है। सभी दरवाजों में डोर स्टॉपर लगाकर रखें। यदि अंगुली फंस या दब जाए और खून निकल रहा हो तो बर्फ का टुकड़ा लगाएं। हल्की चोट होने पर डेटाल से साफ कर बीटाडीन लोशन लगाएं। यदि अंगुली अलग हो गई है तो कटे हुए हिस्से को एक साफ पालीथिन में रखें और एक अन्य पालीथिन में बर्फ भरकर अंगुली वाली पॉलिथीन को उसमें रख दें। चोट लगे हिस्से को साफ कपड़े या बैंडेज से लपेट दें। फिर फौरन पीजीआई पहुंचें। ऐसे में अंगुली को जोड़ पाना संभव होता है।

बिजली के सॉकेट में हाथ डालना
अगर घर आपके घर में छोटा बच्चा है तो घर में लगे बिजली के सारे सॉकेट को टेप से कवर कर दें। मार्केट में प्लास्टिक के सॉकेट ब्लॉकर भी आते हैं। प्रेस, हीटर, चार्जर, टोस्टर जैसे इलेक्ट्रानिक आइटम यूज करने के बाद प्लग निकालकर स्विच आफ कर दें। यदि बच्चे को करेंट लगे तो तुरंत मेन पावर स्विच बंद कर दें। मेन स्विच के बारे में आपको पता होना चाहिए। यदि बच्चा बेहोश हो जाए तो बच्चे को मुंह से सांस दें। बच्चे को बेड पर लिटाकर अपनी एक हथेली दूसरी हथेली पर रखकर बच्चे की चेस्ट दबाएं। दबाव उतना ही हो, जितना एक तकिया को दबाते हैं। तीन बार ऐसा करके फिर सांस दें। फौरन बच्चे को डॉक्टर के पास ले जाएं।

बेड या सीढ़ी से गिरना
दो साल की उम्र तक बच्चे को बेड पर अकेला न छोड़ें। अक्सर बेड से गिरने से बच्चे कोमा में चले जाते हैं। अक्सर पीजीआई से ऐसी खबरें आती हैं। बच्चे को कभी अकेले सीढ़ियों पर न जानें दें। यदि बच्चा बेड से गिर जाए और ऊपर से कोई चोट नहीं दिख रही है तो उसे आराम से लिटा दें। सिर या कहीं और सूजन है बर्फ से सिकाई कर दें। कम से कम 20 मिनट तक सिकाई करें और उसके बाद फौरन डाक्टर के पास ले जाएं। यदि सूजन नहीं है तो अगले 24 घंटे उस पर निगरानी रखें। बेहोशी आने या बच्चे पर सुस्ती छाने पर तुरंत डाक्टर के पास ले जाएं। 12 महीने तक के बच्चे का स्कल बोन बंद नहीं होता, इसलिए सिर की किसी भी चोट को हल्के में न लें।
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पानी की बाल्टी में डूबना या गिरना

baby - फोटो : सोशल मीडिया
ट्राइसिटी से पिछले कई दिनों से ऐसी खबरे आ रही हैं, जिसमें दो साल के बच्चे की बाल्टी से डूबने में मौत हो गई। बच्चे को अकेला बाथरूम में न छोड़ें। बाथरूम में पानी से भरा टब, बाल्टी या ड्रम न रखें। बाथरूम को हमेशा सूखा रखें। टॉइलट क्लीनर, साबुन, शैंपू, डिटर्जेंट, हेयर डायर व शेविंग क्रीम से भी दूर रखें। इससे बचने का यही तरीका है कि बाथरूम को हमेशा बंद कर रखें।

फर्नीचर से चोट लगना
फर्नीचर से बच्चों को चोट लगना भी आम है। कोशिश करें कि फर्नीचर के कोने बहुत नुकीले न हों, न ही उनके ऊपर कांच या मेटल की भारी चीजें सजाएं। अगर आपके फर्नीचर के कोने नुकीले हैं तो उनमें फर्नीचर गार्ड लगवाएं। मार्केट में आसानी से उपलब्ध है। यदि आंख, कान, सिर जैसी संवेदशनशील जगह पर चोट लगे तो तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं।

ये सावधानियां बरतें
- बच्चे के सामने कान या नाक में कुछ न डालें। ईयरबड्स भी नहीं।
- कांच के बर्तन या मेटल की भारी चीजें बच्चों की पहुंच से दूर रखें।
- टेबल क्लोद नीचे लटकता न हो इसका ध्यान रखें। उसके ऊपर खाने-पीने की गर्म चीजें और जलती हुई मोमबत्ती आदि न रखें।
- बच्चे के बिल्कुल करीब बैठकर गर्म चाय/दूध आदि का सेवन न करें।
- कोई भी नुकीली चीज, सिक्के, बीज, रबड़, कलर आदि बच्चे के पास न छोड़ें।
- दवा खुले में न छोड़ें। दवा बेबी कैप वाली हो तो बेहतर है।
-तीन साल तक की उम्र के बच्चों को टाफियां न दें।

बटन बैटरी बच्चों के लिए बहुत खतरनाक है। ये अंदर जाकर फूड पाइप को गला सकती है। यदि कोई बच्चा खा ले तो उसे जल्द से जल्द अस्पताल पहुंचाना होगा। पेरेंट्स को मेरी सलाह है कि वे बच्चों को ऐसी चीजों से दूर रखें और जरूरत से ज्यादा सावधानियां बरतें।
- उषा दत्ता, प्रोफेसर गेस्ट्रोएंट्रोलाजी डिपार्टमेंट, पीजीआई

पीजीआई में हर हफ्ते तीन से चार केस पहुंचते हैं। पीजीआई में तो ऐसे मरीजों का इलाज मिल जाता है, लेकिन यदि देरी हुई या कोई चीज ज्यादा फंस गई तो बचाना मुश्किल होता है। ऐसे में पेरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चों का ख्याल रखें। ऐसी चीजों से बच्चों की दूरी बनाकर रखें।
- डॉ. केएलएन राव, पूर्व एचओडी पीडियाट्रिक सर्जरी पीजीआई
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