मुंह या सांस के जरिए निकलने वाली बड़ी बूंदें गुरुत्वाकर्षण की वजह से जल्दी से सतह पर आती हैं जबकि महीन बूंदें कुछ देर तक हवा में रहती हैं। इनका का व्यास पांच माइक्रॉन से कम होता है। इन्हें ‘ड्रॉपलेट न्यूक्लिआई’ कहा जाता है। माइक्रॉन का मतलब एक मीटर का दस लाखवां हिस्सा। इसका सीधा मतलब है कि संक्रमित व्यक्ति के सांस छोड़ने, बात करने और खांसने के दौरान निकलने वाली उन बूंदों में भी वायरस मौजूद होते हैं, जो बहुत सूक्ष्म होने के कारण कुछ समय तक हवा में रहती हैं। ऐसे में लोगों को घर, दुकान व दफ्तर की खिड़कियां खोल कर रखनी चाहिए। जहां पर हवा क्रास की जगह न हो तो वहां पर एग्जॉस्ट फैन लगाएं। दुकान, दफ्तर व कैंटीन में बैठने के दौरान जितनी दूरी हो सके, बनानी होगी। -प्रो. राजेश कुमार, पूर्व विभागाध्यक्ष स्कूल आफ पब्लिक हेल्थ पीजीआई
नंबर तो अभी और बढ़ेंगे, मगर चिंता की बात नहीं
नंबर तो अभी और बढ़ेंगे। जो संक्रमित हैं, वे अपने से ज्यादा लोगों को और संक्रमित करेंगे लेकिन मैं कहूंगा कि घबराने की बात नहीं हैं। कई लोग ठीक भी हो रहे हैं। मैं कुछ लोगों को जानता हूं, जो पीड़ित थे और अब पूरी तरह से ठीक हो चुके हैं। महामारी जब भी आती है तो इतने तो केस आते ही हैं, लेकिन हमें कोशिश करनी होगी कि मौतें न हों। मरने वालों में उनकी संख्या ज्यादा है जो बीमार हैं और बुजुर्ग हैं। ऐसे में हमें उन लोगों को कोरोना से बचाना है। हवा में वायरस तो रहता है। भले ही डब्ल्यूएचओ ने बाद में पुष्टि की हो। ऐसे में जो जितनी दूरी रखेगा, वह उतना सुरक्षित रहेगा। मास्क जरूर पहनें। - एसके जिंदल, पूर्व एचओडी, पल्मोनेरी डिपार्टमेंट पीजीआई