जनसंख्या के मामले में भारत का स्थान विश्व में दूसरे नंबर पर आता है। वहीं 25 साल तक की उम्र के युवाओं की संख्या के मामले में देश का नंबर दुनियाभर में पहले स्थान पर आता है।
देश की जीडीपी में यूथ का योगदान भी सबसे अधिक है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन यूथ में खुद की फाइनेंशियल इनवेस्टमेंट और अपने बेहतर भविष्य के लिए सेविंग को लेकर कोई जागरूकता नहीं है। देश की यही आबादी ऐसी है, जिसका औसतन खर्च सबसे अधिक होता है।
फाइनेंशियल मैनेजमेंट फर्म की डायरेक्टर अमनजोत कौर के अनुसार अगर हम अमूमन एक युवा की नौकरी शुरू करने की बात करें तो लगभग 22 वर्ष की उम्र तक पढ़ाई समाप्त कर काफी हद तक यूथ नौकरी शुरू कर देते हैं। नई नौकरी, पहली सैलरी और फिर शुरू होती है खर्चों की आदत।
अमूमन अधिकतर युवा अपने कुछ शौक ट्रैवलिंग, शॉपिंग, महंगा मोबाइल, स्पोर्ट्स बाइक या कार खरीदने जैसे शौक जो वह अपने पेरेंट्स के पैसे या पढ़ाई के दौरान नहीं कर पाते, उन्हें पूरा करने में जुट जाते हैं। मगर सही मायनों में सेविंग का सही वक्त भी यही होता है।
एक फाइनेंशियल सलाहकार के तौर पर अमनजोत ने बताया कि पहली सैलरी के साथ ही सेविंग शुरू कर देनी चाहिए। सेविंग चाहे छोटी ही क्यों न हो, लेकिन इसकी आदत डालनी चाहिए।
जरूरी है प्लानिंग
जैसे हम अपने भविष्य के बारे में पहले से प्लानिंग कर लेते हैं कि हमें क्या करना है या किस फील्ड में जाना है, ठीक वैसे ही हमें सेविंग के लिए प्लानिंग करनी भी जरूरी है। समय पर और ठीक जगह शुरू की गई सेविंग भविष्य में फायदा देती है। बचत अपनी सैलरी और जरूरी खर्चे को देखते हुए ही करनी चाहिए। इसके लिए युवाओं को फाइनेंशियल एडवाइजर से जरूर कंसल्ट करना चाहिए।
इसलिए जरूरी है यंग एज में सेविंग
फाइनेंशियल एडवाइजर के अनुसार सेविंग जितनी यंग एज में शुरू की जाए, उतना फायदा देती है। अगर कोई 20 से 25 साल की उम्र से केवल 2000 रुपये प्रत्येक माह बचत शुरू करता है, तो 60 की उम्र तक पहुंचने पर उसके पास अच्छी खासी सेविंग होगी।
सेविंग और इनवेस्टमेंट में समझें फर्क
फाइनेंशियल सलाहकार अमनजोत के अनुसार युवाओं को सबसे पहले सेविंग और इनवेस्टमेंट में फर्क समझना होगा। ये दोनों अलग-अलग टर्म हैं। यूथ को नौकरी शुरू करने के बाद सबसे पहले सेविंग शुरू करनी चाहिए। इसके लिए काफी विकल्प हैं। इन दिनों इनमें सबसे प्रचलित सिस्टमेटिक इनवेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) है।
इसमें लॉन्ग टर्म इनवेस्टमेंट करने से अच्छा फायदा होता है। इसके अलावा बैंक सेविंग अकाउंट, फिक्सड डिपाजिट (एफडी), नेशनलाइज्ड बैंक में रेगुलर डिपाजिट (आरडी), डेबट म्युचुअल फंड्स, इंपलाइज प्रोविडेंट फंड (ईपीएफ), पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएफ) और पोस्ट आफिस की स्कीम मौजूद हैं। इनमें बैंक 4.5 से लेकर 9.20 प्रतिशत तक ब्याज देते हैं।
जितना ज्यादा रिस्क, उतना ज्यादा फायदा
अमनजोत के अनुसार नेशनल बैंकों की स्कीम में रिटर्न कम होता है, हालांकि उसमें सौ फीसदी गारंटी होती है कि सेविंग या इनवेस्टमेंट में रिटर्न मिलेगा। वहीं इक्विटी में निवेश करने से पहले इसके बारे में ठीक से जान लेना जरूरी है। इसमें शार्ट और लॉन्ग टर्म इनवेस्टमेंट होता है।
लॉन्ग टर्म में रिस्क कम होता है, वहीं शार्ट टर्म में रिस्क ज्यादा होता है तो लाभ का चांस भी अधिक होता है। इसके अलावा हाल के कुछ वर्षों में रियल इस्टेट में इनवेस्टमेंट भी नए विकल्प के तौर पर उभरा है, लेकिन इसमें फायदा तभी है अगर इसमें लंबे समय के लिए इनवेस्ट किया जाए।
इनमें मिलती है टैक्स में छूट
आप चाहे सेविंग करें या इनवेस्टमेंट दोनों ही सूरतों में इस बात का ख्याल जरूर रखें कि आपको उससे टैक्स में छूट का फायदा मिल रहा है या नहीं। केंद्र सरकार पीपीएफ, पेंशन फंड, लाइफ इंश्योरेंस, यूलिप, होम लोन, 5 साल की बैंक एफडी, पोस्ट आफिस डिपाजिट, सुकन्या समृद्घि योजना, नेशनल पेंशन स्कीम (एनपीएस), मेडिकल इंश्योरेंस आदि में 80सी और 80 सीसीडी के तहत टैक्स में छूट भी देती है।