कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन में पंजाब के करीब 22 किसान अपनी जान गंवा चुके हैं। अपनों को खो चुके इन परिजनों का कलेजा देखिए कि ये आज भी किसान आंदोलन की सफलता के लिए अरदास कर रहे हैं। भरी आंखों के साथ गर्व से कहते हैं कि पंजाबी कुर्बानी से नहीं डरते। किसान और जवान तो हमेशा देश के लिए अपनी जान कुर्बान करते आए हैं। अफसोस है तो सिर्फ इतना कि केंद्र सरकार किसानों का दर्द नहीं समझ रही।
गांव माहमूजोइयां के किसान बलदेव राज (60) की 13 नवंबर को यहां के टोल प्लाजा पर चल रहे धरने के दौरान दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी। उनका पूरा परिवार अब भी दिल्ली बॉर्डर पर चल रहे धरने में डटा है। माहमूजोइयां के ज्यादातर परिवार दिल्ली बॉर्डर पर धरने में पहुंचे हैं। मृतक बलदेव राज के बड़े भाई कश्मीर लाल (67) वासी माहमूजोइयां, तहसील जलालाबाद जिला फाजिल्का का कहना है कि उनके भाई की कुर्बानी व्यर्थ नहीं जाएगी। उनके पूरे परिवार के साथ बलदेव की पत्नी मंजीत कौर, दोनों बेटे रमन कुमार व विपन कुमार दिल्ली बॉर्डर पर धरने में बैठे हैं।
कहते हैं, कृषि कानून रद्द करवाकर ही लौटेंगे। बलदेव 44 दिन तक धरने में थे और अब वह खुद दिन-रात धरनास्थल पर जिम्मेदारी निभा रहे हैं। गांव माहमूजोइयां से लगभग 56 लोग दिल्ली धरने में पहुंचे हैं और यहां से रोजाना लोग दिल्ली पहुंच रहे हैं। उन्होंने बताया कि जो किसान दिल्ली गए हैं, उनके खेतों व पशुओं की देखरेख किसान यूनियन के सदस्य कर रहे हैं।
चार एकड़ जमीन से चलता है घर का गुजारा : भजनो देवी
भजनो देवी निवासी गांव सलाच जिला गुरदासपुर ने बताया कि उनके पति स्वर्ण दास लंबे समय से जम्हूरी किसान सभा के साथ जुड़े थे। बीमार होने के बावजूद वह आंदोलन का हिस्सा थे। 13 दिसंबर को किसानों के हकों के लिए लड़ी जा रही लड़ाई के दौरान धरनास्थल पर मौत हो गई। पति के मरने के बाद भी उनका परिवार किसान आंदोलन में बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहा है। तीन लड़कियां और दो बेटे हैं। सभी की शादी कर दी है। चार एकड़ जमीन है, उसी से घर का गुजारा चलता है। भजनो देवी कहती हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कृषि कानून वापस लेने ही होंगे, यदि ऐसा नहीं हुआ तो उनका परिवार हर तरह की शहादत देने को तैयार है।
बेटे की मौत के बाद उजड़ गई दुनिया : चरणजीत कौर
गांव झमट, तहसील पाइल, जिला लुधियाना निवासी चरणजीत कौर का बेटा बलजिंदर सिंह (32) भी आंदोलन की इस लड़ाई में शहीद हो गया। उसकी बुजुर्ग मां उसे याद कर रोती रहती हैं। कहती हैं कि तीन साल पहले पति और अब बेटा उसे अकेला छोड़कर वाहे गुरु के पास चले गए। बेटे की मौत के बाद उसकी दुनिया ही उजड़ गई। घर में कमाने वाला अकेला बेटा था। बलजिंदर की पत्नी अमनदीप कौर का कहना है कि पति बाइक पर दिल्ली धरने में शामिल होने जा रहे थे। दो दिसंबर को सिंघु बार्डर के पास सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई। दो बच्चे हैं, एक बेटा (3) व बेटी (6)। उनके पास पांच एकड़ जमीन है, जिस पर खेती कर घर का गुजारा चलता है, अब घर में कमाने वाला कोई नहीं है। फिर भी उनका परिवार किसान आंदोलन के साथ है।
मजदूर मक्खन खान किसानों का कर रहे थे समर्थन
जिला मोगा के गांव भिंडर कलां के रहने वाले बादल खान व कश्मीर अली ने कहा कि उनके पिता मक्खन खान किसान आंदोलन में शामिल हुए थे और दिल्ली बॉर्डर पर धरने में गए थे। वहां 13 दिसंबर को दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई। परिवार का गुजारा पिता की कमाई से होता था। अब भी उनका परिवार किसान आंदोलन का समर्थन करता है। उनके पिता का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। मोदी सरकार को कृषि कानून वापस लेने ही होंगे।
किसान आंदोलन में 22 पंजाबियों की हुई मौत
सुनाम के किसान रामपाल शर्मा, किसान भूपिंदर सिंह, गुरदासपुर के किसान मक्खन सिंह व दिल्ली में धरने में शामिल किसान गुरदेव सिंह ने बताया कि किसान आंदोलन के दौरान तकरीबन 22 पंजाबियों की मौत हो चुकी है। इनमें 18 साल से कम और 75 साल से अधिक आयु के किसान व मजदूर शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इनकी कुर्बानी इतिहास के पन्नों में दर्ज होगी। कृषि कानून रद्द करके ही पंजाब के किसान व मजदूर अपने घर लौटेंगे। रोजाना पंजाब से लोगों के जत्थे दिल्ली पहुंच रहे हैं। जो लोग आंदोलन दौरान शहीद हुए हैं, उनकी याद में रोजाना रात को मोमबत्तियां जलाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। किसानों ने कहा कि आजादी हो या फिर हक की लड़ाई, बलिदान देने से पीछे नहीं हटेंगे। केंद्र सरकार को यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए।