चंडीगढ़ के मामले में भी हुई थी चर्चा
पीजीआई के एक पूर्व विभागाध्यक्ष के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने जिस युवक के मामले में फैसला दिया है, उसके साथ हुए गंभीर हादसे के बाद उसे पीजीआई में भर्ती कराया गया था। वह लंबे समय तक गंभीर अवस्था में रहा और विशेषज्ञ स्तर पर उसकी स्थिति को देखते हुए लाइफ सपोर्ट हटाने के विकल्प पर चर्चा भी हुई थी। हालांकि उस समय परिवार इसके लिए सहमत नहीं हुआ और उपचार जारी रखा गया।विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद इच्छा मृत्यु और गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को लेकर चर्चा फिर तेज हो गई है। ऐसे में पीजीआई जैसी संस्थाओं की ओर से पहले से तैयार की गई स्पष्ट गाइडलाइन डॉक्टरों और मरीज के परिवारों के लिए ऐसे जटिल मामलों में महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।
पीजी की चौथी मंजिल से गिरा था हरीश राणा
पीयू के छात्र हरीश राणा के साथ साल 2013 में हुआ एक हादसा उनकी पूरी जिंदगी बदल गया। सेक्टर-15 के एक पेइंग गेस्ट (पीजी) आवास की चौथी मंजिल से गिरने के बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इस घटना के बाद वह लंबे समय तक बेहोशी और गंभीर चिकित्सकीय अवस्था में रहे।
वर्षों बाद उनका मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दे दी। बताया जाता है कि अगस्त 2013 में गाजियाबाद निवासी हरीश राणा चंडीगढ़ में रहकर बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे और सेक्टर-15 के एक पीजी में रहते थे। देर रात अचानक तेज आवाज सुनकर पीजी में रहने वाले छात्र और आसपास के लोग नीचे पहुंचे तो हरीश राणा जमीन पर गंभीर रूप से घायल पड़े मिले। लोगों ने तुरंत उन्हें अस्पताल पहुंचाया। बाद में हालत ज्यादा गंभीर होने पर उन्हें जीएमसीएच-32 में भर्ती कराया गया।
डॉक्टरों के अनुसार गिरने के कारण हरीश राणा के सिर में गंभीर चोट आई थी और उन्हें आईसीयू में रखकर इलाज शुरू किया गया। उस समय चिकित्सकों ने उनकी हालत बेहद नाजुक बताई थी। हादसे का असर इतना गहरा था कि वह सामान्य जीवन में वापस नहीं लौट सके और लंबे समय तक वेजिटेटिव अवस्था में रहे। हरीश राणा अपने कॉलेज में फिटनेस और जोश के लिए जाने जाते थे। वह जिम में नियमित अभ्यास करते थे और प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेते थे। पढ़ाई में भी वह अच्छे छात्र माने जाते थे और भविष्य को लेकर बड़े सपने देखते थे। घटना की सूचना मिलने के बाद पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच की थी और पीजी में रहने वाले छात्रों व मकान मालिक से पूछताछ की थी। प्रारंभिक जांच में इसे चौथी मंजिल से गिरने का हादसा माना गया। कई वर्षों तक गंभीर अवस्था में रहने के बाद परिवार ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और जीवन रक्षक उपचार समाप्त करने की अनुमति मांगी। मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसके बाद यह पुराना हादसा एक बार फिर चर्चा में आ गया।