पर्यावरण सहजने की दिशा में काम कर रहे अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ मंगलवार को अमर उजाला के दफ्तर पहुंचे और अपने प्रयासों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इस दौरान सबने चंडीगढ़ की हरियाली पर चिंता जाहिर की। चंडीगढ़ की पेरीफेरी के जंगलों से लगातार पेड़ गायब होते जा रहे हैं। फलदार पेड़ों और घोसले बनाने की जगह कम होने से पक्षियों की संख्या में कमी आई है।
पर्यावरण संरक्षण में साइक्लिंग का अहम रोल है। साइकिलगीरी के सदस्यों ने बताया कि साइकिल चलाने के खतरे जरूर हैं लेकिन आने वाला समय साइकिल का ही है। चंडीगढ़ की किसी भी मार्केट में पार्किंग की कोई जगह नहीं है। सुखना लेक पर सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है।
विशेषज्ञों ने कहा कि चंडीगढ़ क्लीन और ग्रीन सिटी का असल मुकाम तभी हासिल हो पाएगा, जब लोग अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगे। दूसरों के बजाए अपनी सोच को बदलें, अन्यथा आने वाली पीढ़ी ली-कार्बूजिए के कल्पना वाले शहर चंडीगढ़ को ढूंढते रह जाएगी।
चंडीगढ़ को चकरसिया पेड़ की जरूरत नहीं
पर्यावरणविद राहुल महाजन कहते हैं कि शहर में हर साल 2.50 लाख पौधे लगाए जाते हैं लेकिन उसमें से तमाम झाड़ियों वाले पौधे हैं। चंडीगढ़ की पॉपुलेशन बढ़ी है, उस हिसाब से प्रति व्यक्ति एक से दो पेड़ हिस्से में आ रहा है। वहीं, कनाडा में प्रति व्यक्ति आठ हजार पेड़ आ रहे हैं। यहां पेड़ों की कमी व उनके प्रकार को चेक नहीं किया गया।
चकरसिया प्रजाति के पेड़ अधिक लगा दिए गए हैं, जिनकी शहर को जरूरत नहीं थी। प्लांटेशन शहर के मिजाज के मुताबिक नहीं किया गया। पेड़ रोगों की चपेट में हैं। यह दस साल में धीरे-धीरे खत्म हो जाएंगे। इन पेड़ों को बचाने की जरूरत है। पुराने पेड़ों का अधिक महत्व है।
क्या है समाधान : सबसे पहले शहर के प्लांटेशन कल्चर को जानना होगा। उसके मुताबिक पौधों का चयन करना होगा। उन पौधों को बचाने के लिए जिम्मेदारी तय करनी होगी। लोग खुद भी यह जिम्मा निभाएं। पॉलिसी बनाते समय एक्सपर्ट को भी कमेटी में शामिल किया जाए।
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पर्यावरण में योगदान : राहुल महाजन शहरवासियों को उन पेड़ों के प्रति जागरूक कर रहे हैं, जो शहर से लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। चंडीगढ़ व आसपास के इलाकों में गिर चुके पेड़ों को दोबारा से ट्रांसप्लांट करने की योजना लाने का श्रेय भी राहुल महाजन को जाता है।
पौधों की जड़ों में कंक्रीट न डालें
पंजाब विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के प्रो. विनोद कुमार चौधरी कहते हैं कि ब्यूटीफिकेशन के नाम नाम पर पीयू में पेड़ों की जड़ों में कंक्रीट डाला जा रहा है। ईंटें लगाई जा रही हैं। इससे पेड़ों का दम घुट रहा है। वह मर रहे हैं। प्रोनिंग भी सही ढंग से नहीं हो रही, इसलिए आंधी व तूफान से वे उखड़ जाते हैं।
पेस्टीसाइड का प्रयोग हो रहा है। यूरोप में साइक्लिंग के लिए इंसेंटिव की व्यवस्था है। वहां पानी, बेंच आदि के प्रबंध किए गए हैं लेकिन यहां नहीं है। इंफ्रास्ट्रक्चर की समुचित व्यवस्था नहीं है। बिना रिसर्च के ही पॉलिसी बन रही हैं। पर्यावरण को लेकर धरातल पर काम करने वालों की राय या सुझाव नहीं लिया जा रहा है।
क्या है समाधान : ब्यूटीफिकेशन के नाम पर खर्च होने वाले बजट से नए पौधे लगाए जाएं। उनकी सुरक्षा के इंतजाम होने चाहिए। सिविल सोसाइटी को जागना होगा। कंज्यूमर सोसाइटी की धारणा से दूर रहना होगा। पॉलिसी बनाने से पहले फुल स्कैन रिसर्च होना चाहिए।
पर्यावरण में योगदान : पर्यावरण सुरक्षा को लेकर शुरू से ही संजीदा रहे हैं, इसलिए पहली सैलरी से साइकिल खरीदी और उसी से पीयू में आते हैं। साइकिल के फायदों के बारे में हजारों लोगों को बताया, उसमें से 300 से अधिक लोगों ने साइकिल खरीदी और वह चला रहे हैं। पीयू में पेड़ों की जड़ों में डाले जा रहे कंक्रीट के खिलाफ वह अभियान चला रहे हैं ताकि पेड़ों को खुलकर सांस मिल सके।
चोरी हो रही हैं साइकिलें, खड़ी करने की जगह नहीं
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स्त्री रोग विशेषज्ञ एवं साइकिलगीरी ग्रुप की संचालिका डॉ. सुनैना बंसल कहती हैं कि साइकिल चलाना सेहत के लिए अच्छा होता है, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया। उसी को ध्यान में रखकर हमने एक साइकिलगीरी ग्रुप बनाया। इसमें लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है लेकिन कुछ समस्याएं भी हैं। सुखना लेक सहित चंडीगढ़ की मार्केट पर साइकिल के लिए पार्किंग नहीं है।
सुरक्षा नाम की कोई चीज नहीं है, इसलिए लोगों ने साइकिल से मार्केट में जाना बंद कर दिया है। सुखना लेक का भी यही हाल है। यह भले ही छोटी बातें हों, लेकिन एक साइक्लिस्ट के लिए बड़ी मायने रखती हैं। पर्यावरण बचाने का जिम्मा हर व्यक्ति को लेना चाहिए, जागरूक होना चाहिए लेकिन इसकी कमी दिख रही है।
क्या है समाधान : साइकिल चलाने वाले लोगों के लिए पार्किंग में अलग से साइकिल खड़ी करने के लिए जगह की व्यवस्था हो। साइकिल की समस्याओं, नीतियों के संचालन के लिए अलग से विभाग बने। पॉलिसी के बजाय नागरिक खुद अपनी जिम्मेदारी पर्यावरण के प्रति निभाएं।
पर्यावरण के प्रति योगदान : डा. सुनैना बंसल रेगुलर साइकिल चलाती हैं। वे अपने हास्पिटल कार की बजाय साइकिल से आती हैं। साइकिल चलाकर वे न सिर्फ लोगों को जागरूक कर रही हैं बल्कि ग्रीन हाउस गैसों को कम करने की दिशा में अपने स्तर पर कदम उठा रही हैं।
साइकिल ट्रैक पर नहीं हैं लाइटें, दुर्घटना का सताता है डर
डेंटिस्ट एवं साइकिलगीरी ग्रुप की मेंबर डॉ. विजिता मेहता कहती हैं कि चप्पड़चिड़ी ऐतिहासिक है लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए रास्ता ठीक नहीं है। सुखना लेक पर साइकिल चलाने वालों के लिए सामान रखने की व्यवस्था नहीं है, इसलिए लोग साइकिल कम चला रहे हैं।
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पार्किंग की सुविधा नहीं है। रात को साइकिल चलाने वाले बहुत हैं और चलाते भी हैं लेकिन लाइट की व्यवस्था नहीं है। इसके कारण चोटिल होने का डर सताता है। कई बार साइकिल ट्रैक से स्लिप रोड व रेड लाइट दिखाई तक नहीं देती है। ऐसे में साइकिल चलाने वालों को खतरा है। इस ओर अभी तक किसी का ध्यान नहीं गया।
क्या है समाधान : साइकिल ट्रैक पर लाइटें लगाने की जरूरत है। साथ ही जगह-जगह साइकिल चलाने वालों का सामान रखने की व्यवस्था होनी चाहिए। साइकिल चोरी न हों, इसके लिए पार्किंग की सुविधा होनी चाहिए। सभी लोगों को पर्यावरण सुरक्षा के प्रति मिलकर चलना होगा।
पर्यावरण के प्रति योगदान : साइकिल चलाकर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के स्रोत को कम किया है। समय-समय पर साइक्लिंग के प्रति लोगों को मोटीवेट करती हैं।
अपनी सुविधा के लिए कर रहे हैं शहर का कत्ल
आर्किटेक्ट शिल्पा दास का कहना है कि हम अपनी सुविधा के लिए शहर का कत्ल करते जा रहे हैं। ओपन स्पेस खत्म हो रहा है। शहर कंक्रीट का बनता जा रहा है। शहर के साइकिल ट्रैक बनाए तो सुविधा के लिए गए थे लेकिन बिना किसी डिजाइन के। प्रशासन ने साइकिल ट्रैक्स के लिए कोई ढंग से तैयारी नहीं की।
यहां तक कि प्रशासन ने डिजाइन भी नहीं बनाया, जिसकी वजह से कई खतरनाक इंटर सेक्शन बन गए हैं। फ्लाईओवर बना देना बढ़ते ट्रैफिक को रोकने का इलाज नहीं है। पीजीआई के पास अंडरपास की जरूरत थी लेकिन सेक्टर-16 और 17 के बीच बना दिया गया। लोगों की राय ही नहीं ली जाती।
क्या है समाधान: किसी भी नई पॉलिसी को लागू करने से पहले उसके बड़े-बड़े प्रिंट आउट को शहर के सार्वजनिक स्थलों पर लगाने चाहिए और उन पर शहरवासियों की राय मांगनी चाहिए। लोग आपस में मिलेंगे तो समाधान निकलेंगे। हमें प्रशासन की ओर देखने से पहले खुद से शुरुआत कर देनी चाहिए।
पर्यावरण के प्रति योगदान : एक स्मार्ट सिटी में पर्यावरण को संरक्षित करने की ताकत होती हैं। शिल्पा दास पेशे से आर्किटेक्ट हैं। चंडीगढ़ के पुराने कलेवर को वापस लाने के लिए वे पुरजोर कोशिश कर रही हैं।
सिर्फ ट्रैक बना देने से लोग साइकिल नहीं चलाएंगे, उन्हें सेफ महसूस कराना होगा
पीजीआई के प्रो. रविंदर खेवाल ने कहा कि सिर्फ शहरभर में साइकिल ट्रैक का जाल बिछा देने से कोई साइकिल नहीं चलाएगा। लोगों को साइकिल ट्रैक पर सुरक्षित महसूस कराना होगा। सिर्फ नियम बना देने से कुछ फायदा नहीं होने वाला है। यहां सिर्फ प्लान की बात होती है, उसे लागू कैसे करना है और उसे मॉनीटर कैसे करना है, इस पर कोई चर्चा नहीं करता।
लोग कहते हैं कि गाड़ियों से प्रदूषण होता है, नहीं चलाना चाहिए। लेकिन यह कोई नहीं बताता कि कार के अलावा उसके पास और विकल्प क्या हैं। हैरानी की बात है कि लोग 60 सेकेंड ट्रैफिक लाइट पर नहीं रुक पाते हैं। लोगों को आदतें बदलनीं पड़ेंगी।
क्या है समाधान: ट्रैफिक नियमों का पालन करना चाहिए। कच्चे रोड पर न चलें, इससे काफी वायु प्रदूषण होता है। छोटे-छोटे टारगेट लेकर चलें। हर किसी को खुद से शुरुआत करनी होगी। किसी और के साथ का इंतजार न करें। अपने हेल्थ और बच्चों के भविष्य के बारे में सोचें और फिर पर्यावरण को बचाने के लिए काम करें।
पर्यावरण के प्रति योगदान : पीजीआई के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में कार्यरत एडिशनल प्रो. रविंदर खैवाल प्रदूषण और पर्यावरण पर स्टडीज कर रहे हैं, जिनके आधार पर सरकार को पॉलिसी बनाने में मदद मिलती है।
पक्षियों के लिए सेफ सिटी नहीं चंडीगढ़
चंडीगढ़ बर्ड क्लब के प्रेजिडेंट एमएस सेखों का कहना है कि चंडीगढ़ कभी पक्षियों के प्रति फ्रेंडली नहीं रहा है। पक्षियों को बचाने के लिए काफी प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन सिर्फ सामाजिक संस्थाओं की तरफ से, सरकार अभी भी नजरअंदाज किए बैठी है। यही कारण है कि सेक्टर-10 के लेजर वैली, बैंबू गार्डन आदि जगहों से पक्षियों की कई प्रजातियां धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं।
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कभी चंडीगढ़ पक्षियों की चहचहाहट से गूंज उठता था लेकिन अब धीरे-धीरे शांत होता जा रहा है। शहर की बिल्डिंग्स शीशे की बनती जा रही हैं जो सूर्य की रोशनी पड़ने पर पक्षियों को अंधा कर देते हैं।
क्या है समाधान: पक्षियों को बचाने का प्रयास अपने घर से शुरू करें। पक्षी बचेंगे तभी पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा, यह सभी को समझना होगा। शहरवासी किसी का इंतजार न करें, खुद कदम उठाएं। शहर बैरियर फ्री होना चाहिए। दिव्यागों और पक्षियों के लिए शहरवासियों को थोड़ा संवेदनशील होने की जरूरत है।
पर्यावरण के प्रति योगदान : न सिर्फ चंडीगढ़ बल्कि पूरे ट्राइसिटी के लोगों को पक्षियों के प्रति जागरूक करने की दिशा में समय-समय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करते हैं। पक्षियों की संख्या बढ़े इसके लिए घोसले और उनके रहने के लिए एक वातावरण तैयार कर रहे हैं।
विकास जरूरी है, लेकिन पर्यावरण भी हो साथ
पंजाब यूनिवर्सिटी में एनवायरनमेंट स्टडीज के एसोसिएट प्रो. सुमन मोर ने बताया कि किसी भी शहर का विकास जरूरी है लेकिन हेरिटेज पेड़ों की बलि देकर विकास मंजूर नहीं है। दिल्ली में आज अगर प्लाईओवर नहीं बने होते तो वहां सड़कों पर कारों के लिए जगह नहीं होती। बढ़ते ट्रैफिक को देखते हुए चंडीगढ़ में भी जरूरत है लेकिन इसके लिए पुराने पेड़ों को काटना सही नहीं है।
सोलर एनर्जी प्रोडक्शन, रेन वाटर हार्वेस्टिंग, वेस्ट सेग्रीगेशन, ई-वेस्ट मैनेजमेंट आदि नियम बनाए तो गए हैं लेकिन इनके प्रति लोगों को ठीक से जागरूक नहीं किया गया। यहां तक कि नगर निगम के कई अधिकारियों को भी नियमों की जानकारी नही है। ई-वेस्ट को लेकर कोई नियम कानून नहीं है। सेक्टर-25 के पास ई-वेस्ट का एक और डंपिंग ग्राउंड तैयार हो रहा है।
क्या है समाधान: बच्चों में पेड़ों के प्रति लगाव की आदत डालें। उन्हें सिर्फ पौधे लगाने नहीं, उनकी रक्षा कैसे करनी है यह भी बताएं। अब समय आ गया है कि सभी को ऑर्गेनिक वेस्ट पर काम करना चाहिए। लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। हमें अपने लेवल पर ही सही लेकिन छोटे-छोटे कदम उठाने होंगे।
पर्यावरण के प्रति योगदान : समय-समय पर पर्यावरण से संबंधित सेमिनार और वर्कशॉप का आयोजन। पंजाब यूनिवर्सिटी में सूखे और गीले कचरे के अलग-अलग प्रबंधन में उनका बड़ा योगदान है।