आपातकाल के दाैरान चंडीगढ़ के 21 नेताओं को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें से 18 पर मीसा लगा। बुड़ैल जेल में दिए गए बिजली के करंट, सब्जियों की टोकरियों में भेजे गए संदेश और भेष बदलकर चलाया गया आंदोलन। इतना ही नहीं उस समय ऐसी यातनाएं दी गईं जिनकी याद आते ही आज भी रूह कांप उठती है।
25 जून 1975, भारत के लोकतंत्र का सबसे काला दिन, जब आपातकाल लागू हुआ और देश एक खुली जेल में बदल गया। आज इस तानाशाही फैसले को 50 साल पूरे हो रहे हैं, लेकिन चंडीगढ़ में उस दौर की यादें आज भी जिंदा हैं।
जब इमरजेंसी लगी तो मैं 41 साल का था और जनसंघ के यूथ विंग का प्रधान था। कई बड़े नेताओं को रातों-रात उठा लिया गया। ऐसे में संगठन को संभालने की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई। चंडीगढ़ में हर तरफ खौफ था। लोग खुलकर कुछ कह नहीं सकते थे। तब हम दिनभर की खबरें रात को लिखकर चंडीगढ़ के अलग-अलग चौकों के खंभों पर चिपकाते थे। कई साथियों को इसी दौरान पुलिस ने पकड़ लिया लेकिन हम रुके नहीं। हमें अंडरग्राउंड होकर काम करना पड़ा। मैंने गिरफ्तारी से बचने के लिए कई बार भेष बदले। हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और पंजाब में जाकर कार्यकर्ताओं से गुप्त बैठकें करता और संदेश पहुंचाता। सब्जियों की टोकरियों में हम पर्चे छिपाकर संदेश भेजते थे। - पुरुषोत्तम महाजन, 91 वर्षीय
देखने में हो रही थी दिक्कत, लेकिन डॉक्टर को नहीं दिखाने दिया
उस रात को मैं कभी नहीं भूल सकता। 25 और 26 जून 1975 की दरम्यानी रात थी। मैं उन दिनों जनसंघ का महासचिव था। सेक्टर 22 के नेहरू पार्क में भाजपा के वरिष्ठ नेता यज्ञ दत्त शर्मा की जनसभा चल रही थी। रात करीब 12 बजे जैसे ही सभा खत्म हुई, खबर आई कि देश में आपातकाल लागू कर दिया गया है। मुझे तुरंत संगठन की तरफ से संदेश मिला कि यज्ञ दत्त शर्मा को हर हाल में गिरफ्तार होने से बचाना है। मैं उन्हें तुरंत एक सुरक्षित स्थान पर ले गया लेकिन कुछ ही दिनों में मेरे खिलाफ भी मीसा के तहत वारंट जारी हो गया। 27 अगस्त को मुझे गिरफ्तार कर बुड़ैल जेल ले गए। वहां क्या हालात थे, शब्दों में कह पाना मुश्किल है। मेरी आंख में पहले से परेशानी थी, लगातार डॉक्टर से दिखाने की मांग करता रहा लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। - देशराज टंडन, 92 वर्षीय
मुझे करंट लगाया, लगा जिंदा नहीं लौटूंगा
उन दिनों की याद मेरी रूह को कंपा देती है। मैं महज 23 साल का था। पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ का महासचिव था और जेपी आंदोलन के तहत बनी पंजाब-चंडीगढ़ छात्र समिति का अध्यक्ष। 13 जुलाई 1975 को मुझे गिरफ्तार कर लिया गया। मुझ पर यह आरोप लगाया गया कि मैंने लॉ डिपार्टमेंट के बाहर एक बड़ी रैली की और उसमें कहा कि हम इंदिरा गांधी सरकार का तख्ता पलट देंगे। दिसंबर में मेरी रिहाई के आदेश आए, लेकिन मैंने 26 जनवरी 1976 को फिर पंजाब यूनिवर्सिटी में सत्याग्रह किया और दोबारा गिरफ्तारी दी। रात में मुझे सेक्टर-29 की पुलिस लाइन ले जाया गया। वहां मेरे साथ जो हुआ, वो किसी भी इंसान की सहनशक्ति की परीक्षा थी। मेरे दाहिने हाथ की उंगलियों में तांबे की नंगी पतली तारें लपेट दी गईं और मुझे बिजली के करंट दिए गए। ऐसा लग रहा था कि यही मेरी आखिरी रात है, शायद सुबह कभी न देख पाऊं। अगले दिन मुझे बुड़ैल जेल भेज दिया गया। वहां सिर्फ लोहे की सलाखें नहीं थीं, डर, अकेलापन और तानाशाही की चुभन भी कैद थी। सारे मौलिक अधिकार खत्म कर दिए गए थे। कई रातें जेल में इसी सोच में बीतीं कि क्या कभी जिंदा बाहर निकल पाऊंगा लेकिन भारत की मिट्टी में लोकतंत्र की जड़ें गहरी हैं। - सत्यपाल जैन, भारत के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल