सोनीपत में धरने पर बैठे किसान।
- फोटो : फाइल फोटो
नए कृषि कानूनों को रद्द कराने पर अड़े किसान संगठनों से जुड़े नौजवानों में अभी तक अपनी मांगें न माने जाने के खिलाफ नाराजगी है। उनके सब्र का बांध कई बार टूटने के कगार पर पहुंचता है, लेकिन बुजुर्ग किसानों की खींची ‘शांति-शांति’ की लक्ष्मण रेखा उन्हें रोक लेती है।
केंद्र सरकार से कई दौर की वार्ता सिरे न चढ़ने पर नौजवान किसानों का मन अशांत हो रहा है। वे इस मसले का हल जल्दी चाहते हैं। युवा किसान कुलविंदर और मनजोत का कहना है कि धरने पर बैठे बुजुर्गों ने हमें रोक रखा है, वरना संसद भवन पर किसान जत्थेबंदियों का झंडा गाड़ दें। जो किसान पूरे देश के अन्न भंडार भरता है, उसी की सुनवाई नहीं हो रही। धरनों पर डटे बच्चों और महिलाओं की हालत देखकर भी दिल्ली में बैठे बड़े लोगों का मन नहीं पसीज रहा।
किसान मनविंदर, हरपाल व कुलतार ने कहा कि मांगें पूरी न होने पर खून तो बहुत खौल रहा, लेकिन 70-80 साल के बुजुर्गों की हाथ जोड़कर की जा रही शांति-शांति की विनती उन्हें माननी पड़ रही है। उनका केंद्र सरकार से यही सवाल है कि जब हमें ऐसे कानूनों की जरूरत ही नहीं तो फिर किसके फायदे के लिए बनाए और अब इन्हें वापस लेने में क्या दिक्कत आ रही है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार किसानों का आंदोलन फिलहाल राजनीतिक छाप से बचा हुआ है। उन्होंने राजनीतिक दलों का समर्थन तो लिया पर फैसले अपने हाथ ही रखे हैं। नेताओं की भूमिका सिर्फ धरने पर आकर बैठने की है। रोजाना पहुंच रहे नेताओं को किसानों की रणनीति की भनक तक नहीं लगती।
आंदोलन को राजनीति से प्रेरित बताना अनुचित : चढूनी
भाकियू हरियाणा के अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा कि किसान आंदोलन को राजनीति से प्रेरित बताना अनुचित है। धरने को समर्थन देने कोई भी आ सकता है। इसमें किसी तरह की राजनीति किसान संगठन पहले दिन से ही बर्दाश्त नहीं कर रहे। यह विशुद्ध रूप से किसानों से जुड़ा जनांदोलन है।