पिछले चार महीनों से मनवीर अपने माता-पिता के साथ पीजीआई चंडीगढ़ में इलाज करा रहा है। अस्पताल, दवाइयां, कीमोथेरेपी और जांच अब उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। पिता परमजीत सिंह बेटे के लिए ढाल बनकर खड़े हैं।
आठ साल की उम्र में जहां बच्चे खेल-कूद और पढ़ाई की दुनिया में मग्न रहते हैं, वहीं पंजाब के नवांशहर जिले के बलाचौर का रहने वाला मासूम मनवीर सिंह जिंदगी की सबसे कठिन जंग लड़ रहा है।
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ब्लड कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से मनवीर न सिर्फ एक बार उबर चुका है, बल्कि किस्मत ने दूसरी बार फिर उसकी परीक्षा ली है। बीमारी लौटने के बावजूद मनवीर का हौसला और जज्बा कमजोर नहीं पड़ा।
चार माह से चल रहा इलाज
पिछले चार महीनों से मनवीर अपने माता-पिता के साथ पीजीआई चंडीगढ़ में इलाज करा रहा है। अस्पताल, दवाइयां, कीमोथेरेपी और जांच अब उसकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुके हैं। पिता परमजीत सिंह बेटे के लिए ढाल बनकर खड़े हैं। आंखों में चिंता जरूर है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा भरोसा और उम्मीद। उनका कहना है कि बेटे की मुस्कान सारी थकान दूर कर देती है।
पुलिस अधिकारी बनने का है सपना
बीमारी और दर्द के बीच भी मनवीर के सपने जिंदा हैं। वह बड़ा होकर पुलिस अधिकारी बनकर देश की सेवा करना चाहता है। कमजोर शरीर के बावजूद जब वह पूरे आत्मविश्वास से कहता है कि “मैं पुलिस बनूंगा”, तो उसकी हिम्मत सबको भावुक कर देती है।
पीजीआई के हंसराज सराय जैसे आश्रय स्थल उन परिवारों के लिए सहारा बने हुए हैं, जो दूर-दराज से इलाज के लिए आते हैं। मनवीर की कहानी सिर्फ बीमारी की नहीं, बल्कि उम्मीद, संघर्ष और परिवार के अटूट साथ की मिसाल है। यह मासूम उम्र में हौसले की ऐसी कहानी है, जो हर किसी को लड़ना सिखाती है।