केंद्र के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब में धरने पर बैठे किसान अगले 15 दिन के लिए मालगाड़ियों और यात्री गाड़ियों के संचालन पर राजी हो गए हैं। किसानों का यह आंदोलन रेलवे को काफी महंगा पड़ा है।
सूबे में मालगाड़ियों की आवाजाही बंद करने से रेल मंत्रालय को 19 नवंबर तक 892 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो चुका है वहीं, कोयले और खाद की किल्लत झेल रहे पंजाब में पहुंचने वाले कोयले के 78 रैक और खाद के 34 रैक मालगाड़ियां बंद होने से बार्डर पर ही अटके हैं। सीमेंट से लदे 8 रैक और स्टील व अन्य सामान के लदे 112 कंटेनर भी पंजाब पहुंचने के लिए बार्डर पर मालगाड़ियों का इंतजार कर रहे हैं। इस तरह करीब 230 रैक पंजाब बार्डर पर अटके हुए हैं।
रेलवे के अनुसार, पंजाब में ट्रेनें नहीं चलने के कारण बीते 55 दिन में 825 करोड़ का राजस्व घाटा हुआ है, जबकि 67 करोड़ रुपये का अतिरिक्त घाटा आंदोलनकारी किसानों के रेल पटरियों पर बैठे रहने के कारण हुआ है। इस अवधि के दौरान पंजाब में 3850 मालगाड़ियां लोड-अनलोड नहीं हो सकीं, जबकि पंजाब में प्रतिदिन औसतन 30 रैक अनलोड होते हैं और 40 रैकों की लोडिंग होती रही है। इन 40 रैकों की लोडिंग से रेलवे को हर रोज 14.85 करोड़ रुपये की कमाई होती थी। इस बीच, पंजाब के भीतर इस समय माल से लदे 22 रैक विभिन्न स्टेशनों पर अटके हुए हैं। इसके साथ ही 96 रेल इंजन भी पंजाब के विभिन्न स्टेशनों पर रुके हुए हैं। बीते 55 दिनों के दौरान पंजाब आने-जाने वाली 2352 यात्री गाड़ियों को या तो रद्द कर दिया गया या उनका रूट बदला गया है।
रेलवे की शर्तों ने उकसाया किसानों को
रेलवे की ओर से ट्रेनें रुकने के कारण हो रहे घाटे का तो हवाला दिया जा रहा है, लेकिन बीते 55 दिन की हड़ताल के दौरान रेल मंत्रालय ने आंदोलनकारी किसानों को मनाने के बजाय उकसाने का ही काम किया है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह द्वारा आंदोलनकारी किसानों से रेल ट्रैक खाली करने की बार-बार अपील किए जाने पर किसानों ने पहले अपने रेल रोको आंदोलन से मालगाड़ियों की आवाजाही को छूट देने का एलान किया था, लेकिन रेलवे ने तब यह शर्त लगा दी कि जब तक सभी ट्रैक और प्लेटफार्मों से आंदोलनकारी नहीं हट जाते, तब तक ट्रेनें नहीं चलेंगी।
इसके बाद किसानों से मुख्यमंत्री की अपील पर 32 स्थानों पर रेल ट्रैक और प्लेटफार्म से अपना धरना हटा कर अन्यत्र स्थानों पर लगा दिया। तब रेलवे ने नई शर्त लगा दी कि मालगाड़ियों को यात्री गाड़ियों के साथ ही चलाया जाएगा। रेलवे का यह रुख देखकर आंदोलनकारी किसान भी जिद पर अड़ गए और वीरवार को बैठक तक फैसला लिया कि रेलवे पहले मालगाड़ियां चलाए, उसके बाद किसान संगठन यात्री गाड़ियों को छूट देने के बारे में विचार करेंगे। आखिरकार इस गतिरोध को खत्म करने के लिए मुख्यमंत्री को खुद आगे आना पड़ा और उन्होंने शनिवार को किसान संगठनों के नेताओं से बैठक कर उन्हें रेल रोको आंदोलन से हटने पर मना लिया है। इस तरह, सूबे में रेल सेवा बहाल करने के मुद्दे पर किसानों ने अब गेंद केंद्र के पाले में डाल दी है।