वेबसाइट पर डलवाई थी लिस्ट
चंडीगढ़ पैरेंट एसोसिएशन ने इस बार किताबों और कॉपियों का मुद्दा जनवरी में ही उठा दिया था। इसके बाद शिक्षा विभाग ने सभी स्कूलों को नोटिस किया कि अपनी किताबों की लिस्ट वेबसाइट पर डाल दें जिससे पब्लिशर उनको छाप सकें और मोनोपोली खत्म की जा सके। लेकिन दो स्कूलों ने ऐसा नहीं किया, जिसके बाद दोबारा नोटिस भेजा गया, तब जाकर दो स्कूलों ने भी किताबों की लिस्ट डाली। इसके बाद भी कुछ ऐसा पब्लिशर आ गए जिनका अता पता तक नहीं है।
हमने बदलाव का प्रयास किया
हमने इस बार बदलाव का प्रयास किया था। शिक्षा विभाग ने कार्रवाई भी की। स्कूलों को नोटिस दिया कि उनकी किताबें वेबसाइट पर डलवाईं। नतीजन दो से तीन दुकानों में यह किताबें उपलब्ध भी हो गईं पर तीन से चार स्कूलों ने किताबें नहीं डालीं, जिनको बाद में नोटिस देने पर उन्होंने भी इसको फॉलो किया। फिर भी कई किताबें ऐसी हैं जो कि एक ही दुकान पर उपलब्ध हैं। -नितिन गोयल, प्रेसीडेंट, चंडीगढ़ पैरेंट्स एसोसिएशन
शिक्षा के इस सिंडिकेट को तोड़ना होगा
जब लिस्ट मिली तो हमने इन किताबों को नई दिल्ली तक मंगवाने का प्रयास किया पर वहां भी कोई किताब उपलब्ध नहीं थी। यह किताबें चंडीगढ़ सेक्टर-47 की एक दुकान पर ही मिलीं। मजबूरन नौ हजार रुपये में किताबें खरीदनी पड़ीं। शिक्षा के इस सिंडिकेट को तोड़ना होगा क्योंकि हरेक अभिभावक अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहता है। -शादाब राठी, अभिभावक
मैंने अपने बच्चों के लिए किताबें खरीदीं तो सातवीं कक्षा की किताबें 2900 रुपये में मिलीं जबकि कॉपियां हमने नहीं लीं। यही किताबें अगर किसी दूसरी दुकान से खरीदी जाएं तो कीमत करीब 3000 रुपये तक पहुंच जाती है। सबसे ज्यादा अंतर कॉपियों के दामों में देखने को मिलता है, जहां अलग-अलग दुकानों पर कीमतों में काफी वैरिएशन है। -जीशान अंसारी, अभिभावक
किताबों के धंधे का गणित
चंडीगढ़ में प्राइवेट स्कूल 83
एक प्राइवेट स्कूल में बच्चे 900 (औसत)
एक बच्चे की किताबें 6000 (औसत)
कुल धंधा 44.82 करोड़ रुपये
इस बार सभी स्कूलों को नोटिस इश्यू किए थे, जिसके बाद किताबों की लिस्ट स्कूलों ने पहले ही वेबसाइट पर डाल दी थी। लेकिन अभी भी शिकायतें आ रहीं है। हमारी इस समस्या पर नजर है। इसको खत्म करने का प्रयास किया जाएगा। -नीतिश सिंगला, डायरेक्टर, एजूकेशन, चंडीगढ़ शिक्षा विभाग