चंडीगढ़। शहर में औद्योगिक विकास को गति देने के लिए प्रशासन ने अहम कदम उठाया है। प्रशासक गुलाब चंद कटारिया ने डीसी निशांत कुमार यादव की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की है। यह कमेटी औद्योगिक क्षेत्र में न केवल बिल्डिंग बायलाॅज में छूट देने बल्कि फ्लोर एरिया रेशो (एफएआर) बढ़ाने को लेकर रिपोर्ट सौंपेगा। यह कमेटी बिल्डिंग बायलॉज में जरूरी बदलाव को लेकर रिपोर्ट देगी। इसके लिए यह कमेटी आगे 11 सदस्यों की कमेटी तैयार करेगी। इस 11 सदस्यीय कमेटी में प्रशासन के अलग-अलग विभाग जैसे इंडस्ट्री, एस्टेट, आर्किटेक्ट, इंजीनियरिंग व अन्य विभाग शामिल होंगे।
औद्योगिक प्लॉट्स के लिए एफएआर बढ़ाने का प्रस्ताव, निवेश पलायन रोकने की कोशिश
समिति के एजेंडे में सबसे अहम प्रस्ताव औद्योगिक प्लॉट्स के लिए एफएआर बढ़ाने का है। फिलहाल चंडीगढ़ के इंडस्ट्रियल एरिया फेज-1 और फेज-2 में एफएआर 0.75 निर्धारित है, जिसे उद्योग जगत लंबे समय से अव्यावहारिक बता रहा है। चैंबर ऑफ चंडीगढ़ इंडस्ट्रीज के वाइस प्रेसिडेंट नवीन मंगलानी का कहना है कि मोहाली, पंचकूला, डेराबस्सी, बरवाला और बद्दी जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में एफएआर 2.5 से 3 तक है जबकि चंडीगढ़ में निर्माण की अनुमति बेहद सीमित है। इस असमानता के चलते निवेशक चंडीगढ़ के बजाय अन्य शहरों का रुख कर रहे हैं। शहर के उद्योगपति काफी समय से एफएआर बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।
एफएआर बढ़ाने के साथ ही शुल्क में होगा संशोधन
वर्ष 2000 में प्रशासन ने औद्योगिक प्लॉट्स के लिए एफएआर को 0.75 से बढ़ाकर 1.0 करने और ग्राउंड कवरेज को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत करने की अनुमति दी थी, वह भी केवल साइकिल शेड के निर्माण के लिए। यह छूट 1 एकड़ तक के प्लॉट्स पर लागू थी। हालांकि इस सुविधा का लाभ बहुत कम उद्योगों ने उठाया क्योंकि एफएआर बढ़ाने के बदले लगाई गई फीस को बहुत ज्यादा बताया गया। अब प्रशासक द्वारा डीसी कम एस्टेट ऑफिसर की अध्यक्षता में गठित की गई कमेटी इन पुराने प्रावधानों की समीक्षा कर उन्हें अधिक व्यावहारिक बनाने पर काम कर रही है।
आर्किटेक्चरल कंट्रोल की जगह जोनिंग
कमेटी एक और अहम सुधार की तैयारी में है। 2 कनाल तक के औद्योगिक प्लॉट्स के लिए आर्किटेक्चरल कंट्रोल हटाकर जोनिंग पैरामीटर्स लागू किए जाएंगे। मौजूदा व्यवस्था में 2 कनाल तक के प्लॉट्स पर सख्त आर्किटेक्चरल कंट्रोल लागू हैं, जबकि 2 कनाल से बड़े प्लॉट्स जोनिंग नियमों के दायरे में आते हैं। इंडस्ट्रियल एरिया फेज-1 और फेज-2 में 5 मरला से लेकर 44 एकड़ तक के प्लॉट्स मौजूद हैं। आंकड़ों के अनुसार, फेज-1 में 5 मरला से 1 कनाल तक के छोटे प्लॉट्स कुल प्लॉट्स का 33 प्रतिशत हैं, जबकि फेज-2 में इनकी हिस्सेदारी 95 प्रतिशत तक है। ऐसे में नियमों का सबसे ज्यादा बोझ छोटे उद्योगों पर पड़ रहा है।