संस्कार भारती द्वारा आयोजित भरतमुनि नाट्य फेस्टिवल के अंतर्गत अलंकार थियेटर ग्रुप द्वारा नाटक लुप्त का मंचन किया गया। इस नाटक का डायरेक्शन ऋषभ शर्मा द्वारा किया गया। नाटक को प्रशांत मेहरा, शिवम कंबोज और गौरव कुमार ने लिखा है। यह नाटक एक जर्नलिस्ट की कहानी है जो कि विशुद्ध रूप से एक पत्रकार है और उनकी खबरों को समाचार पत्र छापता नहीं है।
इस नाटक की कहानी में एक पत्रकार ताहिर खान (काल्पनिक नाम) है। ताहिर का बॉस उसकी एक खबर रोक लेता है। यह खबर उन पत्रकारों की है जिनकी हत्या कर दी गई। ताहिर इसके संबंध में सोचता है और कहानी फ्लैश बैक में चली जाती है। दिखाया जाता है कि ताहिर ने नई-नई नौकरी की तो उसकी हर खबर को प्रकाशित किया गया। दिखाया जाता है कि उसकी पहली स्टोरी वशीकरण पर थी, जिसे लोग पसंद करते हैं क्योंकि वह वशीकरण करने वाले बाबाओं की पोल खोलता है।
जातिवाद पर भी डाला प्रकाश
नाटक का मंचन करते कलाकार
दूसरी स्टोरी युवाओं पर होती है, ऐसे युवा कि जिनकी नई-नई शादी होती है। फिर उसके सामने सारा कुछ घूम जाता है, वह देखता है कि ऐसा कुछ क्यों है, क्यों लोग सच को सामने नहीं आने देना चाहते। खासतौर से वह लोग जिनकी ज्यादा जिम्मेदारी बनती है। ताहिर सोचता है कि अखबार तो डॉ. भीमराव अंबेदकर ने भी निकाला था। क्या उस वक्त भी परिस्थितियां ऐसी थीं जिसकी वजह से उनको यह अखबार निकालना पड़ा। फिर कहानी में डॉ. भीमराव अंबेदकर के कैरेक्टर की इंट्री होती है।
इसमें दिखाया जाता है कि किस प्रकार से उनके समय में जातिवाद चरम सीमा पर था। इसी वजह से उन्होंने संकल्प लिया कि वह पढ़ेंगे और पढ़कर अपने लोगों का भला करेंगे। जर्नलिस्ट बात करता है कि किस तरह से करतार सिंह सराभा ने 19 वर्ष की उम्र में अखबार को लोगों तक पहुंचाया था। फिर करतार सिंह सराभा की यात्रा दिखाई जाती है। इस नाटक का अंत होता है डॉ. भीमराव अंबेदकर, करतार सिह सराभा और ताहिर खान एक ही स्टेज पर आ जाते हैं और बात करते हैं कि सच कब तक लोगों से छुपा रहेगा वह तो नगरवधु है जो सबके सामने नाचेगी।
जिसे देखकर गूंगा भी बोल उठेगा। इसमें जर्नलिस्ट का किरदार प्रशांत मेहरा, डा. भीमराव अंबेदकर का शिवम कंबोज और करतार सिंह सराभा का किरदार गौरव कुमार ने किया। इसमें ताहिर कहता है कि सच को तमीज नहीं है बात करने की, झूठ कितना मीठा बोलता है।