चंडीगढ़। यूटी प्रशासन शहर के सभी नए वाणिज्यिक भवनों के लिए ऊर्जा संरक्षण भवन कोड को अनिवार्य रूप से लागू करने जा रही है। इसके लिए प्रशासन ने ड्राफ्ट तैयार कर लिया है। सभी विभागों से चर्चा के लिए सेक्टर-26 स्थित महात्मा गांधी राज्य लोक प्रशासन संस्थान में बैठक की गई। इसमें कोड के सभी पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हुई।
नई वाणिज्यिक इमारतों में ऊर्जा दक्षता में सुधार के लिए ईसीबीसी बनाया गया है। ईसीबीसी को ऊर्जा मंत्रालय ने मई 2007 में वाणिज्यिक भवन क्षेत्र में ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देने की दिशा में पहला कदम के रूप में शुरू किया था। इस कोड को 2017 में अपडेट किया और अनिवार्य रूप से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं। ईसीबीसी 100 किलोवाट से अधिक भार वाले नए वाणिज्यिक भवनों के निर्माण के लिए ऊर्जा प्रदर्शन मानकों को निर्धारित करती है। चंडीगढ़ में ईसीबीसी का ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया है, जिस पर चर्चा चल रही है। हाल ही में इलेक्ट्रिकल सर्कल के सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर रंजीत सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में प्रशासन के आर्किटेक्चर विभाग, टाउन प्लानिंग, डिस्कॉम, क्रेस्ट, चंडीगढ़ हाउसिंग बोर्ड, ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट, नगर निगम और चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर के अधिकारी शामिल हुए। इसमें कोड के नियमों पर चर्चा की गई। विभाग की तरफ से कहा गया कि ड्राफ्ट को सभी हितधारकों को उनकी टिप्पणियों और प्रतिक्रिया के लिए भेज दिया गया है। इसके बाद एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जाएगा जो ईसीबीसी की अधिसूचना और कार्यान्वयन के कार्य की निगरानी करेगी। अब तक पड़ोसी राज्य पंजाब, हरियाणा, हिमाचल सहित 20 से अधिक राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने संबंधित क्षेत्र में इन कोड को पहले ही अधिसूचित कर दिया है।
नए वाणिज्यिक भवनों में कई बदलाव होंगे
विभाग की तरफ से बताया गया कि कोड के लागू होने के बाद शहर में बनने वाले सभी नए वाणिज्यिक भवनों को इनका पालन करना होगा। इसके तहत कई नियमों का पालन करना होगा, जिसमें सोलर अनिवार्य रूप से लगाना, खिड़की की साइज, कॉरिडोर में सेंसर लगाना ताकि अगर नेचुरल लाइट आए तो बिजली से चलने वाली लाइटें खुद बंद हो जाएं समेत कई बदलाव करने होंगे। विभाग के अनुसार ईसीबीसी 2017 के सफल अनुपालन से पूरे देश में 2030 तक लगभग 300 अरब इकाइयों की ऊर्जा बचत होगी। एक वर्ष में 15 गीगावाट से अधिक की ऊर्जा मांग में भी कमी आएगी। इससे तकरीबन 35,000 करोड़ की बचत तो होगी ही साथ ही 250 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी भी आएगी।