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Haryana: यूपी-हरियाणा के बीच सीमा विवाद बरकरार, यमुना की धारा के साथ बदलती है किसानों की किस्मत

Thu, 04 Apr 2024 04:48 PM IST
निवेदिता वर्मा ब्यूरो/संवाद, करनाल/पानीपत/सोनीपत (हरियाणा)

सार

केंद्र की तरफ से घोषित दीक्षित अवार्ड में यमुना में हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमाएं निर्धारित हैं, लेकिन इसके बाद भी यमुना नदी की धारा हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमा निर्धारण का केंद्र बिंदु मानी जाती है। मानवीय और प्राकृतिक कारणों के चलते यमुना की धारा अब बदल रही है, लेकिन अफसरों की अनदेखी के कारण इसका रिकॉर्ड नहीं बदला जा रहा। यही कारण है कि यमुना की यह सोना पैदा करने वाली धरती हमेशा से हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच विवाद का कारण बनती है।
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यमुना नदी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बीते पांच दशक में कई दलों की सरकारें सत्ता में आईं, लेकिन हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच जमीन पर कब्जे का विवाद हल नहीं हो पाया। दरअसल हरियाणा और यूपी के बीच यमुना नदी विभाजन का काम करती है। 

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यमुना के धारा बदलने से हर साल कभी हरियाणा की जमीन यूपी के हिस्से में चली जाती है तो कभी यूपी की जमीन हरियाणा की तरफ आ जाती है। इस जमीन पर कब्जे और फसल को लेकर हर साल विवाद होता है। दोनों तरफ के राजस्व अधिकारी हर साल जमीन की पैमाइश कराते हैं, लेकिन विवाद का स्थायी हल नहीं निकलता। न ही किसी सरकार ने इस पर ध्यान दिया और न ही स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों ने कभी जिम्मेदारी समझी। हरियाणा की तीन जिलों करनाल, पानीपत और सोनीपत के तीन लाख किसानों की आबादी वाले 92 गांवों की जमीन इस विवाद में फंसती है। फसल बिजाई और कटाई के समय इस तरह के विवाद सामने आते हैं। किसानों के बीच लाठी-डंडों के साथ गोलियां भी चल जाती हैं।

यह बात नहीं है कि किसान इसका स्थायी समाधान नहीं चाहते। दोनों प्रदेशों के किसान इसको लेकर तत्पर हैं। किसानों का कहना है कि यमुना में प्रशासन की ओर से स्टड नहीं लगाए गए। बाढ़ के समय यमुना का बहाव तेज होने के कारण भूमि कटाव शुरू होता है। कई दफा हरियाणा की ओर भूमि कटाव होता है, जबकि कई दफा उत्तरप्रदेश की ओर की जमीन नदी में चली जाती है। इससे उत्तर प्रदेश के किसान हरियाणा में अपनी भूमि होने का दावा करते हैं। इसके अलावा यहां काफी हिस्सा खनन का भी आता है, उसे लेकर भी विवाद उपजते हैं।
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धारा बदलने में खनन के साथ प्राकृतिक आपदा भी बड़ा कारण
यमुना की धारा हर बार बदलने के पीछे प्राकृतिक और मानवीय कारण हैं। प्राकृतिक कारण तेज बारिश होने पर यमुना नदी में बाढ़ आना है। पानी का बहाव धारा को बदलता है। ऐसे में यमुना कभी हरियाणा तो कभी उत्तर प्रदेश की तरफ बहती है। दूसरा मानवीय कारण यमुना में खनन है। ठेकेदार पोकलेन मशीन से यमुना से रेत निकालते हैं। बहते पानी में रेत साफ निकलता है। इसके बाजार में अच्छे रेट मिलते हैं, जबकि सूखी यमुना से मिट्टी के साथ निकली रेत के कम दाम मिलते हैं। इस लिए ठेकेदार कई जगह 10 से 12 फीट तक रेत खनन कर देते हैं, जो कि पानी आने पर कुंड बन जाते हैं। जुलाई, अगस्त और सितंबर में रेत खनन बंद किया जाता है। यमुना में बारिश का पानी आता है तो कुंडों में पानी गिरकर धारा दूसरी तरफ मुड़ जाती है। इससे कच्चे बांधों में कटाव शुरू हो जाता है। यही धारा परिवर्तन किसानों की जमीन का विवाद बनती है।

दो दर्जन से अधिक बार खूनी संघर्ष, गोलियां चलीं, अफसर तक बंधक बनाए
सीमा विवाद में यूपी व हरियाणा के किसानों के बीच फसल बुआई व कटाई के समय सबसे ज्यादा संघर्ष होता है। वर्ष 1997 में सांकरौद के यमुना खादर में सोनीपत के भैरा बांकीपुर के ओमपाल सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी थी। उसको लेकर काफी बवाल हुआ था और अफसरों को बंधक बनाया गया था। किसानों के बीच हुई फायरिंग में बागपत के कुर्डी गांव के विशंभर की मौत हो गई थी। 1997 व 1998 में खुर्मपुर व नंगला बहलोपुर गांव के किसानों के बीच जमकर बवाल हुआ था और उस समय कई लोगों को गोली लगी थी। उसके बाद भी जाजल व निवाड़ा के किसानों के बीच बवाल हुआ तो खुर्मपुर व नंगला बहलोलपुर के किसानों में झगड़ा हुआ। अप्रैल, 2021 में नगला बहलोलपुर के अनिल की हत्या हो गई। वहीं जाजल व निवाडा के लोगों के बीच कई बार संघर्ष हो चुका है। अब तक करीब दो दर्जन से अधिक बार खूनी संघर्ष हो चुका है।

विवाद का हल : सर्वे ऑफ इंडिया की निशानदेही पर लग रहे पिलर
दोनों राज्यों की सीमाओं को बांटती यमुना में हदबंदी के लिए वर्ष 1974 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री उमाशंकर दीक्षित की ओर से एक बिल का मसौदा तैयार किया गया था। इस पर वर्ष 1975 में दोनों राज्यों को अमल करने के लिए कहा गया, ताकि यमुना और इसके अंदर की जमीन पर खेतीबाड़ी को लेकर दोनों राज्यों के किसानों के बीच विवाद न हो। अब पिलर लगाने का काम दीक्षित ऑवार्ड-1974 को आधार मानकर किया जाएगा। वर्ष 2007 में पहली बार यमुना नदी के किनारे पिलर बने थे, लेकिन वे बह गए। बाद में वर्ष 2021 में करनाल में पायलट प्रोजेक्ट के तहत बने पिलर सफल रहे। अब सर्वे ऑफ इंडिया की निशानदेही पर दीक्षित अवार्ड के तहत नए सिरे से छह जिलों में मजबूत बाउंड्री पिलर बनाने की योजना चल रही है। नए डिजाइन में पिलर की ऊंचाई 21.5 मीटर रखी गई है। इन पिलरों पर नंबर भी अंकित किए जा रहे हैं। ओड नंबर हरियाणा और ईवन नंबर यूपी के लिए हैं। पिलर लगाने की प्रक्रिया करनाल जिले में शुरू हो चुकी है। यमुनानगर, पानीपत, सोनीपत, फरीदाबाद और पलवल में सर्वे ऑफ इंडिया की ओर से निशानदेही की जा रही है।

शामलात देह की जमीन पर नहीं मालिकाना हक
यमुना नदी के साथ लगते गांवों का दूसरा बड़ा मुद्दा शामलात देह की जमीन का है। किसानों की जमीन की मलकियत नहीं हो पा रही है। पानीपत के साथ यमुनानगर, करनाल, सोनीपत, फरीदाबाद और पलवल में यह बड़ा मुद्दा है। अकेले पानीपत के 15 गांवों की लगभग 10 हजार एकड़ जमीन है। हर जिले में लगभग इतनी ही जमीन शामलात देह की है। किसानों का मानना है कि गांवों में जमीन का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा शामलात जमीन है। ऐसे में किसानों को न लोन मिल रहा है और न ही बेचने का अधिकार है। किसानों की तीसरी और चौथी पीढ़ी संघर्ष कर रही है। बाढ़ आने पर भी मुआवजा तक नहीं मिल पाता। 1960 से पहले तामशाबाद, राणा माजरा, पत्थरगढ़ और नवादा पार गांव का यूपी में रिकॉर्ड था। ये गांव बाद में हरियाणा में आ गए थे। इनके किसानों को जमीन का मालिकाना हक मिला हुआ है।

हरियाणा गठन के समय का है मुद्दा : एडवोकेट रतन सिंह
यमुना किनारे की जमीन के मालिकाना हक को लेकर आवाज उठा रहे यमुना सुधार समिति के अध्यक्ष अधिवक्ता रतन सिंह रावल ने बताया कि यमुना नदी के आसपास के किसानों की जमीन के अधिकार और मलकियत के मुद्दे को कई बार प्रशासन के सामने रख चुके हैं। इसे सरकार के प्रतिनिधियों के सामने भी रखा गया। हरियाणा गठन के बाद आज तक मलकियत का मुद्दा बना हुआ है। इसका कोई हल नहीं हो पाया है। जमीन की मलकियत न होने से किसान केवल खेती करने तक का ही मालिक है। वह इससे आगे कुछ नहीं कर सकता। उसको मुआवजा तक नहीं मिल पाता। किसानों ने पिछले महीने पानीपत में किसान महापंचायत की थी। पिछले लोकसभा चुनाव में भी इस विषय को रखा था, लेकिन आश्वासन के बाद कोई समाधान नहीं हुआ।

समाधान की जरूरत : पूर्व मंत्री
यमुना के साथ लगते गांवों में सीमा विवाद और किसानों को जमीन का मालिकाना हक नहीं मिलना बड़ा मुद्दा है। सरकार को इसका समाधान करना चाहिए। उनकी सरकार आने पर इन सब समस्याओं का प्रमुखता से समाधान कराया जाएगा। वे किसानों के मुद्दों को ऊपर लेकर जाएंगे।- बिजेंद्र सिंह कादियान (बिल्लू), पूर्व मंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता

यूपी सरकार से कर रहे बात : राज्यमंत्री
पानीपत समेत प्रदेश के कई जिलों का उत्तर प्रदेश के किसानों के बीच यमुना नदी में सीमा का विवाद है। उत्तर प्रदेश सरकार से बात कर इसका स्थायी समाधान कराया जा रहा है। पानीपत में करीब 16 लाख की लागत से स्थायी पिलर लगाए जा रहे हैं। जमीन के मालिकाना हक का भी हल निकाला जाएगा। - महिपाल ढांडा, विकास एवं पंचायत राज्यमंत्री हरियाणा सरकार

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