सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट कर चुका है कि यदि मजिस्ट्रेट को किसी आरोपी की आयु 21 वर्ष से कम प्रतीत होती है तो उस स्थिति में वह आरोपी की उम्र को लेकर जांच सुनिश्चित करेंगे। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के चंडीगढ़ निवासी छात्र अक्षय चोपड़ा ने इस मामले में याचिका दाखिल की थी।
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के बावजूद आरोपियों की गिरफ्तारी के समय उनकी उम्र का पता लगाने को लेकर पुलिस की लापरवाही के चलते नाबालिगों को वयस्कों के तौर पर जांच में शामिल होकर ट्रायल का सामना करना पड़ता है। ऐसे कई उदाहरण के साथ दाखिल याचिका पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान इसे बेहद गंभीर मामला करार दिया। हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार, हरियाणा सरकार व यूटी प्रशासन सहित तीनों की लीगल सर्विस अथॉरिटी को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है।
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याचिका दाखिल करते हुए नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के चंडीगढ़ निवासी छात्र अक्षय चोपड़ा ने हाईकोर्ट को बताया कि कानून का उल्लंघन करने वाले नाबालिगों के मामलों को अन्य अपराधियों से अलग रखने के लिए केंद्र सरकार ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट बनाया था। इस एक्ट के अनुसार नाबालिगों के आपराधिक मामलों के लिए वयस्कों से अलग व्यवस्था है।
जेजेए के तहत गिरफ्तारी के दौरान ही आरोपी की उम्र का निर्धारण किया जाना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। याचिकाकर्ता ने 6 ऐसे मामले हाईकोर्ट के समक्ष रखे जहां केस दर्ज होने के महीनों बाद जाकर आरोपियों को नाबालिग माना गया। याची ने कहा कि जेजेए का असल उद्देश्य नाबालिगों को अपराधियों के संपर्क में आने से बचाना और उनका कल्याण है। यदि आरंभ में ही नाबालिगों को कुख्यात अपराधियों के साथ जेल में रखा जाएगा तो वह एक्सपोज हो जाएंगे। यदि गिरफ्तारी के समय ही आरोपी की उम्र को लेकर उचित कार्रवाई नहीं होगी तो एक्ट का उद्देश्य ही समाप्त हो जाएगा।
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सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट कर चुका है कि यदि मजिस्ट्रेट को किसी आरोपी की आयु 21 वर्ष से कम प्रतीत होती है तो उस स्थिति में वह आरोपी की उम्र को लेकर जांच सुनिश्चित करेंगे। याची पक्ष को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला बेहद गंभीर है और जनहित से जुड़ा है। ऐसे में हाईकोर्ट ने हरियाणा व पंजाब के मुख्य सचिव और चंडीगढ़ में प्रशासक के सलाहकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है। इसके साथ ही तीनों की लीगल सर्विस अथॉरिटी को पक्ष बनाते हुए नोटिस जारी कर दिया है।