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डेरा सचखंड बल्लां: आस्था, दलित अस्मिता और राजनीति का संगम, सामाजिक चेतना और सत्ता संतुलन का प्रभावशाली प्रतीक

Thu, 29 Jan 2026 07:09 PM IST
चंडीगढ़ ब्यूरो सुरिंदर पाल, जालंधर

सार

डेरा सचखंड बल्लां की आत्मा गुरु रविदास जी के दर्शन में निहित है। समानता, श्रम की गरिमा, मानवता और जाति-मुक्त समाज की अवधारणा गुरु रविदास की शिक्षाओं का मूल है।
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संत निरंजन दास जी से आशीर्वाद लेते कैबिनेट मंत्री मोहिंदर भगत, मेयर वनीत धीर और अन्य। - फोटो : संवाद
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विस्तार
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जालंधर स्थित डेरा सचखंड बल्लां अब केवल एक धार्मिक स्थल नहीं रहा। यह पंजाब की सामाजिक चेतना, दलित आत्मसम्मान, धार्मिक पहचान और सत्ता की राजनीति के बीच खड़े एक ऐसे केंद्र के रूप में उभरा है जहां आस्था की गूंज के साथ-साथ राजनीतिक रणनीतियों की आहट भी साफ सुनाई देती है। बीते दो दशकों में डेरा बल्लां ने खुद को धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठाकर सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव के एक बड़े केंद्र के रूप में स्थापित किया है।

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मायावती से लेकर कई केंद्रीय मंत्री, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी सहित अनेक दिग्गज नेता यहां नतमस्तक हो चुके हैं। अब यहां नेताओं की मौजूदगी महज श्रद्धा का प्रतीक नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी मानी जाती है।

डेरा सचखंड बल्लां की आत्मा गुरु रविदास जी के दर्शन में निहित है। समानता, श्रम की गरिमा, मानवता और जाति-मुक्त समाज की अवधारणा गुरु रविदास की शिक्षाओं का मूल है। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, कर्म से होनी चाहिए। सदियों से हाशिये पर रहे समाज के लिए यह दर्शन आत्मसम्मान, संघर्ष और उम्मीद की मशाल बना।
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डेरा बल्लां इसी चेतना का केंद्र बना जिसने दलित समाज को न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान भी दी। यह स्थल पूजा तक सीमित न रहकर सामाजिक जागरूकता और आत्मसम्मान का मंच बन गया।

वियना कांड से बदली पहचान की दिशा
वर्ष 2009 में वियना में संत रामानंद दास पर हुए हमले और उनकी शहादत ने इस परंपरा को निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया। पंजाब में फैले विरोध और आक्रोश ने यह स्पष्ट कर दिया कि सामाजिक अपमान और धार्मिक पहचान से जुड़ा दर्द कितना गहरा है। इस घटना के बाद डेरा द्वारा रविदासिया धर्म को स्वतंत्र पहचान देने का निर्णय लिया गया। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल गुरु रविदास की वाणी को अलग कर अमृतवाणी तैयार की गई। हालांकि सिख संस्थाओं ने इसका विरोध किया। आलोचकों ने इसे समाज को धार्मिक खांचों में बांटने वाला कदम बताया, जबकि समर्थकों के लिए यह आत्मसम्मान और पहचान की पुनर्स्थापना थी।

धर्म से राजनीति तक प्रभाव
डेरा बल्लां की बढ़ती सामाजिक पकड़ ने इसे पंजाब की चुनावी राजनीति का अहम केंद्र बना दिया है। दलित मतदाता की निर्णायक भूमिका के चलते राजनीतिक दल इसे रणनीतिक दृष्टि से देखते हैं। हालांकि डेरा कभी किसी दल को खुला समर्थन नहीं देता और न ही वहां से राजनीतिक हुक्म जारी किए जाते हैं। डेरा ने गुरु रविदास जी की जन्मस्थली वाराणसी के सीर गोवर्धनपुर में भव्य मंदिर का निर्माण कराया है जहां हर साल लाखों श्रद्धालु जुटते हैं। हरियाणा के सिरसगढ़, पुणे के कटराज सहित देश-विदेश में कई दरबार स्थापित किए गए हैं।

समाज सेवा और संगठन की भूमिका
डेरा सचखंड बल्लां शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी सक्रिय है। जरूरतमंदों के लिए धर्मार्थ अस्पताल और स्कूल संचालित किए जा रहे हैं। गुरु रविदास जी के दर्शन के प्रचार-प्रसार के लिए पुस्तकें, पत्रिकाएं और ऑडियो-वीडियो सामग्री प्रकाशित की जाती है। शोधकर्ताओं और विद्वानों को भी प्रोत्साहित किया जाता है।

डेरा सचखंड बल्लां का संक्षिप्त इतिहास

  • स्थापना : 1895, संत पीपल दास ने की।
  • दूसरे प्रमुख : संत सरवन दास (1928–1972)
  • वाराणसी में गुरु रविदास जन्मस्थली मंदिर का निर्माण।
  • 1994 से संत निरंजन दास गद्दीनशीन।
  • दलित व रविदासिया समाज को संगठित करने में अहम भूमिका।
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